हा दैव! अब वे दिन कहाँ हैं और वे रातें कहाँ ? हैं काल की घातें कि कल की आज हैं बातें कहाँ ? क्या थे तथा अब क्या हुए हम, जानता बस काल है; भगवान् जाने, काल की कैसी निराली चाल है ! (UPSC 2024, 10 Marks, )

हा दैव! अब वे दिन कहाँ हैं और वे रातें कहाँ ? हैं काल की घातें कि कल की आज हैं बातें कहाँ ? क्या थे तथा अब क्या हुए हम, जानता बस काल है; भगवान् जाने, काल की कैसी निराली चाल है !