थे गरजती, गूँजती आन्दोलिता गहराइयों से उठ रहीं ध्वनियाँ, अतः उद्भ्रान्त शब्दों के नये आवर्त में हर शब्द निज प्रति-शब्द को भी काटता, वह रूप अपने बिम्ब से ही जूझ विकृताकार-कृति है बन रहा, ध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से यहाँ।। (UPSC 2012, 12 Marks, )

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