मनुष्य का मनुष्य के साथ जितना गूढ़, जटिल और व्यापक सम्बन्ध हो सकता है, उतना वस्तु के साथ नहीं। वस्तु-लोभ के आश्रय और आलम्बन, इन दो पक्षों में भिन्न-भिन्न कोटि की सताएँ रहती हैं; पर प्रेम एक ही कोटि की दो सताओं का योग है, इससे वह कहीं अधिक गूढ़ और पूर्ण होता है।
(UPSC 1981, 20 Marks, )