सिला-साप-पाप, गुह गीध को मिलाप, सबरी के पास आप चलि गये हौ सो सुनी मैं। सेवक सराहे कपिनायक बिभीषन, भरत सभा सादर सनेह सुर-धुनी मैं॥ आलसी-अभागी-अधी-भारत-अनाथपाल, साहेब समर्थ एक नीके मन गुनी मैं। दोष दुख दारिद दलैया दीनबंधु राम, तुलसी न दूसरो दयानिधान दुनी मैं॥
(UPSC 1985, 20 Marks, )