निर्गुन कौन देस को बासी? मधुकर! हँसि समुझाय, सौंह दै बूझत साँच, न हाँसी।। को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी? कैसो बरन भेस है कैसो केहि रस में अभिलासी॥ पावैगो पुनि कियो आनो जो रे! कहैगो गाँसी।। सुनत मौन ह्वै रह्यो ठग्यो सो सूर सबै मति नासी॥
(UPSC 2001, 20 Marks, )