कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।। तत्त्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।। सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं।। प्रभु संदेसु सुनत वैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही। (UPSC 2007, 20 Marks, )

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