मेरी भव-बाधा हरी, राध्या नागरि सोइ। जा तन की झाँई परै, स्यामु हरित-दुति होङ।। कहल, नटल, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियाल। भरे भौन मैं करत हैं, नैननु हीं सब बात।। नहिं परागु नहिं मधुर मधु नहिं बिकासु इहिं काल। अली, कली ही सौं बंध्यौ, आगं कौन हवाल।। (‘बिहारी-सतसई’, दोहा सं. 1, 32, 38)। (UPSC 2000, 20 Marks, )

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