आरंभिक हिन्दी के विकास में अपभ्रंश की भूमिका को स्पष्ट कीजिए। (UPSC 2018, 15 Marks, )

आरंभिक हिन्दी के विकास में अपभ्रंश की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।

Introduction

अपभ्रंश के विविध भाषिक रूपों से आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का विकास हुआ, लेकिन इसका व्यवस्थित अध्ययन कठिन है। रूद्रट ने अपभ्रंश के देशभेदों को भूरिभेद कहा, जो एक ही भाषा के स्वाभाविक भेद थे। राजशेखर के समय तक अपभ्रंश संपर्क भाषा के रूप में पंजाब से गुजरात तक प्रचलित थी। विष्णु धर्मोतरकार के अनुसार, अपभ्रंश के भेदों का अंत नहीं है। अपभ्रंश के साहित्यिक रूपों से हिंदी, गुजराती, मराठी, बांग्ला आदि भाषाओं का विकास हुआ।

Explanation

प्रश्न में अपभ्रंश की भूमिका को स्पष्ट करने के लिए हमें यह समझना होगा कि अपभ्रंश भाषाओं का विकास कैसे हुआ और उन्होंने आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के विकास में क्या योगदान दिया।
 1. अपभ्रंश का साहित्यिक रूप: अपभ्रंश के साहित्यिक रूप ही उपलब्ध हैं, जो विभिन्न प्रादेशिक भाषिक रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उदाहरण के लिए, शौरसेनी अपभ्रंश से पश्चिमी हिन्दी भाषाओं का विकास हुआ, जैसे कि बुन्देली, कन्नौजी, ब्रजभाषा आदि।
 2. प्रादेशिक भेद और परिवर्तन: अपभ्रंश के प्रादेशिक भेदों का विवरण मिलता है, जो आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के विकास में सहायक सिद्ध हुए। उदाहरण के लिए, मागधी अपभ्रंश की पूर्वी शाखा से बांग्ला, उड़िया, असमिया भाषाओं का विकास हुआ।
 3. साहित्यिक अपभ्रंश का प्रभाव: अपभ्रंश साहित्य का विकास मालवा, राजस्थान और गुजरात में हुआ। इन क्षेत्रों के भाषिक रूपों से रजित साहित्यिक अपभ्रंशों में साहित्यिक रचना हुई। जैसे कि, नागर अपभ्रंश से राजस्थानी, मालवी, मेवाड़ी, जयपुरी, मारवाड़ी और गुजराती का विकास हुआ।
 4. भाषाई संपर्क और विकास: अपभ्रंश के विविध रूपों से आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का विकास हुआ। उदाहरण के लिए, ब्राचड अपभ्रंश से सिंधी और पैशाची अपभ्रंश से कश्मीरी का विकास हुआ।
 5. भाषाई विविधता और संपर्क भाषा: अपभ्रंश के विविध रूपों ने संपर्क भाषा के रूप में कार्य किया, जिससे विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद स्थापित हुआ। रूद्रट ने अपभ्रंश के देशभेदों को भूरिभेद कहकर एक ही भाषा के स्वाभाविक भेद बतलाया।
 6. साहित्यिक उदाहरण: अपभ्रंश साहित्य में रचित रचनाएं जैसे कि "कुवलयमाला" और "पउमचरिउ" इस बात का प्रमाण हैं कि अपभ्रंश ने साहित्यिक भाषा के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 7. भाषाई विकास की प्रक्रिया: अपभ्रंश के विविध रूपों से आधुनिक भाषाओं का विकास एक जटिल प्रक्रिया थी, जिसमें उच्चारण, ध्वन्यात्मक और स्वनिक अंतर महत्वपूर्ण थे।
 इन बिंदुओं के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि अपभ्रंश ने आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह प्रक्रिया विभिन्न प्रादेशिक और भाषाई भेदों के माध्यम से संचालित हुई, जिसने आधुनिक भाषाओं के स्वरूप को आकार दिया।

Conclusion

अपभ्रंश का आरंभिक हिन्दी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। रूद्रट और विष्णु धर्मोतरकार जैसे विद्वानों ने इसके विविध रूपों को पहचाना। अपभ्रंश के प्रादेशिक भेदों ने आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं जैसे हिन्दी, गुजराती, मराठी आदि के विकास में आधारभूत भूमिका निभाई। यद्यपि अपभ्रंश के सभी रूपों का साहित्यिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, परंतु इसके प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। भविष्य में, भाषाई अनुसंधान से इन संबंधों को और स्पष्ट किया जा सकता है।