सुरा सुरभिमय वदन अरुण वे नयन भरे आलस अनुराग; कल कपोल था जहाँ बिछलता कल्पतृक्ष का पीत पराग। विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाये चले गये। आह! जले अपनी ज्वाला से फिर वे जल में गले, गये।।
(UPSC 2013, 10 Marks, )
सुरा सुरभिमय वदन अरुण वे नयन भरे आलस अनुराग; कल कपोल था जहाँ बिछलता कल्पतृक्ष का पीत पराग। विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाये चले गये। आह! जले अपनी ज्वाला से फिर वे जल में गले, गये।।
सुरा सुरभिमय वदन अरुण वे नयन भरे आलस अनुराग; कल कपोल था जहाँ बिछलता कल्पतृक्ष का पीत पराग। विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाये चले गये। आह! जले अपनी ज्वाला से फिर वे जल में गले, गये।।
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