मेरे जाति पाति, न चहौं काहू की जाति पाँति, - मेरे कोऊ काम को, न हौं काहू के काम को। लोक परलोक रघुनाथ ही के हाथ सब, भारी है भरोसो तुलसी के एक नाम को। अति ही अयाने उपखानो नहिं बूझैं लोग, 'साह ही को गोत, गोत होत है गुलाम को’। (UPSC 2003, 20 Marks, )

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