बीती नहीं यद्यपि अभी तक है निराशा की निशा— है किन्तु आशा भी कि होगी दीप्त फिर प्राची दिशा ! महिमा तुम्हारी ही जगत में धन्य आशे ! धन्य है, देखा नहीं कोई कहीं अवलम्ब तुम-सा अन्य है।। आशे, तुम्हारे ही भरोसे जी रहे हैं हम सभी, सब कुछ गया पर हाय रे! तुमको न छोड़ेंगे कभी। आशे, तुम्हारे ही सहारे टिक रही है यह मही, धोखा न दीजो अन्त में, बिनती हमारी है यही।
(UPSC 2012, 12 Marks, )
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बीती नहीं यद्यपि अभी तक है निराशा की निशा— है किन्तु आशा भी कि होगी दीप्त फिर प्राची दिशा ! महिमा तुम्हारी ही जगत में धन्य आशे ! धन्य है, देखा नहीं कोई कहीं अवलम्ब तुम-सा अन्य है।। आशे, तुम्हारे ही भरोसे जी रहे हैं हम सभी, सब कुछ गया पर हाय रे! तुमको न छोड़ेंगे कभी। आशे, तुम्हारे ही सहारे टिक रही है यह मही, धोखा न दीजो अन्त में, बिनती हमारी है यही।
(UPSC 2012, 12 Marks, )