स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किये रजाइ कोटि विधि नीका।। यह स्वारथ परमारथ सारू। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू॥ देव एक विनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करन वहोंरी॥ तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जो मनु माना॥ - सानुग पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ। नतरु फेरिअहि बंधु दोउ नाथ चलौ मैं साथ।। (UPSC 1999, 20 Marks, )

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