प्रकृति जोई जाके अंग परी। स्वान-पूँछ कोटिक जो लागै सूधि न काहु करी। जैसे काग भच्छ नहिं छाड़ि जनमत जौन घरी। धोये रंग जात कहु कैसे ज्यों कारी कमरी। ज्यों अहि डसत उदर नहिं पूरत ऐसी धरनि घरी। सूर होउ सो होउ सोच नहिं, तैसे हैं एउ री ॥
(UPSC 2018, 10 Marks, )
प्रकृति जोई जाके अंग परी। स्वान-पूँछ कोटिक जो लागै सूधि न काहु करी। जैसे काग भच्छ नहिं छाड़ि जनमत जौन घरी। धोये रंग जात कहु कैसे ज्यों कारी कमरी। ज्यों अहि डसत उदर नहिं पूरत ऐसी धरनि घरी। सूर होउ सो होउ सोच नहिं, तैसे हैं एउ री ॥
प्रकृति जोई जाके अंग परी। स्वान-पूँछ कोटिक जो लागै सूधि न काहु करी। जैसे काग भच्छ नहिं छाड़ि जनमत जौन घरी। धोये रंग जात कहु कैसे ज्यों कारी कमरी। ज्यों अहि डसत उदर नहिं पूरत ऐसी धरनि घरी। सूर होउ सो होउ सोच नहिं, तैसे हैं एउ री ॥
(UPSC 2018, 10 Marks, )