बालहीना माता की पुकार कभी आती, और आता आर्त्तनाद पितृहीन बाल का; आँख पड़ती है जहाँ, हाय वहीं देखता हूँ सेंदुर पुँछा हुआ सुहागिनी के भाल का; बाहर से भाग कक्ष में जो छिपता हूँ कभी, तो भी सुनता हूँ अट्टहास क्रूर काल का; और सोते-जागते में चौंक उठता हूँ, मानो शोणित पुकारता हो अर्जुन के लाल का। (UPSC 2016, 10 Marks, )

बालहीना माता की पुकार कभी आती, और आता आर्त्तनाद पितृहीन बाल का; आँख पड़ती है जहाँ, हाय वहीं देखता हूँ सेंदुर पुँछा हुआ सुहागिनी के भाल का; बाहर से भाग कक्ष में जो छिपता हूँ कभी, तो भी सुनता हूँ अट्टहास क्रूर काल का; और सोते-जागते में चौंक उठता हूँ, मानो शोणित पुकारता हो अर्जुन के लाल का।
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