निरगुन कौन देश कौ बासी। मधुकर, कहि समुझाइ, सौंह दै बूझति सांच न हांसी॥ को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि को दासी। कैसो बरन, भेष है कैसो, केहि रस में अभिलाषी॥ पावैगो पुनि कियो आपुनो जो रे कहैगो गांसी। सुनत मौन ह्वै रह्यौ ठगो-सौ सूर सबै मति नासी॥ (UPSC 1992, 20 Marks, )

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