बिरहा बुरहा जिनी , बिरहा.है सुलतान। जिह घडि विरह न संचरे, सो घट सदा मसान ! चहु तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाऊं। लेखणि करू करंक की, लिखि लिखि राम पठाऊं ॥ हेरत हेरत हे सखी, रह्मा कबीर हिराइ। बूंद समानी समद मैं, सो कत हेरी जाइ ॥ (UPSC 1988, 20 Marks, )

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