Introduction
आरंभिक हिन्दी तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी की भाषा है, जो अपभ्रंश और अवहट्ट के बाद विकसित हुई। इसमें 'स', 'श', 'ष' के स्थान पर 'स' का प्रयोग, ण व्यंजन का अधिक उपयोग, और क्षतिपूरक दीर्धीकरण प्रमुख थे। ड़ और ढ़ का विकास हुआ, और नपुंसक लिंग समाप्त हो गया। यह भाषा नियोगात्मक बन रही थी, और शब्द क्रम निश्चित होने लगा था। ध्वनियों में संयुक्त स्वर का प्रचलन बढ़ा, और विशेषणों के लिंग-परिवर्तन होने लगे।
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आरंभिक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ अपभ्रंश और अवहट्ट से विकसित हुईं, जिसमें ध्वनियों का विकास हुआ। उत्क्षिप्त व्यंजन 'ड़', 'ढ़' और महाप्राण रूप जैसे 'न्ह', 'म्ह' हिन्दी की ध्वनियाँ हैं। विदेशी भाषाओं के प्रभाव से 'क़', 'ख', 'ग', 'ज', 'फ़' ध्वनियाँ प्रचलित हुईं। आरंभिक हिन्दी में दो लिंग और दो वचन रह गए, और अधिकतम चार कारक रूप मिलते हैं। यह काल 1000 ई. से 1800 ई. तक माना जाता है।
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आरंभिक हिन्दी की प्रमुख विशेषताओं में अपभ्रंश और अवहट्ट से ध्वनियों का विकास, संयुक्त स्वर जैसे ऐ, औ का प्रयोग, और अरबी-फारसी शब्दों का समावेश शामिल है। उत्क्षिप्त व्यंजन जैसे ड़, ढ़ की ध्वनियाँ, और महाप्राण व्यंजन जैसे न्ह, म्ह का विकास हुआ। विदेशी भाषाओं के प्रभाव से क, ख, ग, ज़, फ़ ध्वनियाँ प्रचलित हुईं। क्रिया रूपों की जटिलता कम हुई और पदक्रम निश्चित नहीं था, जैसे विद्यापति और कबीर के लेखन में देखा जा सकता है।
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हिन्दी भाषा का विकास मध्ययुगीन आर्यभाषाओं से हुआ, जिसमें अपभ्रंश और अवहट्ठ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने इसे 'पुरानी हिन्दी' कहा। सिद्धों, नाथपंथियों, चारणों, संतों की वाणी में इसका प्रारंभिक रूप देखा जा सकता है। अमीर खुसरो की रचनाओं में 'हिन्दवी' का उल्लेख मिलता है। ब्रज, अवधी और खड़ी बोली के विकास ने हिन्दी को स्थिरता दी। जायसी, सूर, तुलसी जैसे कवियों ने इसे समृद्ध किया।
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आरंभिक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ अपभ्रंश और अवहट्ट से विकसित हुईं, जिसमें ध्वनियों का विकास हुआ। उत्क्षिप्त व्यंजन 'ड़', 'ढ़' और महाप्राण रूप जैसे 'न्ह', 'म्ह' हिन्दी की अपनी ध्वनियाँ हैं। विदेशी भाषाओं के प्रभाव से 'क़', 'ख', 'ग', 'ज', 'फ़' ध्वनियाँ प्रचलित हुईं। आरंभिक हिन्दी में दो लिंग और दो वचन रह गए, और अधिकतम चार कारक रूप मिलते हैं। यह काल 1000 ई. से 1800 ई. तक माना जाता है।
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