आरंभिक हिन्दी की प्रमुख विशेषताओं का परिचय दीजिए।
(UPSC 2015, 15 Marks, )
आरंभिक हिन्दी की प्रमुख विशेषताओं का परिचय दीजिए।
आरंभिक हिन्दी की प्रमुख विशेषताओं का परिचय दीजिए।
(UPSC 2015, 15 Marks, )
Introduction
आरंभिक हिन्दी की प्रमुख विशेषताओं में अपभ्रंश और अवहट्ट से ध्वनियों का विकास, संयुक्त स्वर जैसे ऐ, औ का प्रयोग, और अरबी-फारसी शब्दों का समावेश शामिल है। उत्क्षिप्त व्यंजन जैसे ड़, ढ़ की ध्वनियाँ, और महाप्राण व्यंजन जैसे न्ह, म्ह का विकास हुआ। विदेशी भाषाओं के प्रभाव से क, ख, ग, ज़, फ़ ध्वनियाँ प्रचलित हुईं। क्रिया रूपों की जटिलता कम हुई और पदक्रम निश्चित नहीं था, जैसे विद्यापति और कबीर के लेखन में देखा जा सकता है।
Explanation
उत्तर:
(i) आरंभिक हिन्दी में ध्वनियाँ अपभ्रंश और अवहट्ट से मिलती-जुलती थीं, लेकिन कुछ नई ध्वनियों का विकास भी हुआ। उदाहरण के लिए, "ऐ", "औ", "आई", "आऊ", "इआ" जैसे संयुक्त स्वर प्रयुक्त होने लगे।
(ii) उत्क्षिप्त व्यंजन "ड़" और "ढ़" की अपनी ध्वनियाँ हैं।
(iii) कुछ व्यंजनों के महाप्राण रूप विकसित हो गए, जैसे "न्ह", "म्ह", "ल्ह" आदि।
(iv) आरंभिक हिन्दी में अरबी, फारसी और तुर्की के पर्याप्त शब्द आ गए।
(v) "ऋ" हिन्दी में तत्सम शब्दों में लिखी जाती है, किन्तु इसका उच्चारण 'रि' की तरह होता है।
(vi) उष्म वर्ग 'ष' लेखन में रहा किन्तु उच्चारण में यह 'श' की तरह उच्चरित होता है। 'य' का 'ज' में तथा 'व' का 'ब' में रूपांतर दिखाई पड़ता है।
(vii) विदेशी भाषाओं के प्रभाव से 'क', 'ख', 'ग', 'ज़', 'फ़' ध्वनियाँ व्यवहृत होने लगीं।
(viii) आदि स्वर लोप (अभ्यंतर > भीतर), मध्य स्वर लोप (चल्ना, कम्रा) एवं अन्त्य स्वर लोप (राम्, अब्, घर्) की प्रवृत्ति आरंभिक हिन्दी में मिलती है।
(ix) हिन्दी में अपभ्रंश के द्वित्व की जगह केवल एक रह गया और पूर्ववर्ती स्वर में क्षतिपूरक दीर्घता आ गई।
(x) क्रिया रूपों की जटिलता और लकारों की विविधरूपता अपभ्रंश में ही कम हो गई थी। आरंभिक हिन्दी में आते-आते मुख्यतया चार लकार ही रह गए - सामान्य लट् (वर्तमान काल), लङ् (सामान्य भूत), लृट (भविष्यत काल) और लोट।
(xi) सहायक क्रियाओं एवं संयुक्त पूर्वकालिक क्रियाओं के रूप स्थिर हो गए।
(xii) आरंभिक हिन्दी में मानक हिन्दी की तरह पदक्रम निश्चित नहीं था। जैसे - "भनहिं विद्यापति", "कहे कबीर सुनो भाई साधु", "बंदौ गुरूपद पदुम परागा"।
(xiii) रचना की दृष्टि से संस्कृत, पालि, प्राकृत आदि की भाषा योगात्मक थी। वियोग्यात्मकता अपभ्रंश से आरंभ हुई और आरंभिक हिन्दी बहुत हद तक वियोग्यात्मक हो गई।
इन विशेषताओं को समझने के लिए कबीर, विद्यापति, और अन्य मध्यकालीन कवियों की रचनाओं का अध्ययन सहायक हो सकता है। उदाहरण के लिए, कबीर के दोहे और विद्यापति के पदों में इन भाषाई विशेषताओं का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है।
(i) आरंभिक हिन्दी में ध्वनियाँ अपभ्रंश और अवहट्ट से मिलती-जुलती थीं, लेकिन कुछ नई ध्वनियों का विकास भी हुआ। उदाहरण के लिए, "ऐ", "औ", "आई", "आऊ", "इआ" जैसे संयुक्त स्वर प्रयुक्त होने लगे।
(ii) उत्क्षिप्त व्यंजन "ड़" और "ढ़" की अपनी ध्वनियाँ हैं।
(iii) कुछ व्यंजनों के महाप्राण रूप विकसित हो गए, जैसे "न्ह", "म्ह", "ल्ह" आदि।
(iv) आरंभिक हिन्दी में अरबी, फारसी और तुर्की के पर्याप्त शब्द आ गए।
(v) "ऋ" हिन्दी में तत्सम शब्दों में लिखी जाती है, किन्तु इसका उच्चारण 'रि' की तरह होता है।
(vi) उष्म वर्ग 'ष' लेखन में रहा किन्तु उच्चारण में यह 'श' की तरह उच्चरित होता है। 'य' का 'ज' में तथा 'व' का 'ब' में रूपांतर दिखाई पड़ता है।
(vii) विदेशी भाषाओं के प्रभाव से 'क', 'ख', 'ग', 'ज़', 'फ़' ध्वनियाँ व्यवहृत होने लगीं।
(viii) आदि स्वर लोप (अभ्यंतर > भीतर), मध्य स्वर लोप (चल्ना, कम्रा) एवं अन्त्य स्वर लोप (राम्, अब्, घर्) की प्रवृत्ति आरंभिक हिन्दी में मिलती है।
(ix) हिन्दी में अपभ्रंश के द्वित्व की जगह केवल एक रह गया और पूर्ववर्ती स्वर में क्षतिपूरक दीर्घता आ गई।
(x) क्रिया रूपों की जटिलता और लकारों की विविधरूपता अपभ्रंश में ही कम हो गई थी। आरंभिक हिन्दी में आते-आते मुख्यतया चार लकार ही रह गए - सामान्य लट् (वर्तमान काल), लङ् (सामान्य भूत), लृट (भविष्यत काल) और लोट।
(xi) सहायक क्रियाओं एवं संयुक्त पूर्वकालिक क्रियाओं के रूप स्थिर हो गए।
(xii) आरंभिक हिन्दी में मानक हिन्दी की तरह पदक्रम निश्चित नहीं था। जैसे - "भनहिं विद्यापति", "कहे कबीर सुनो भाई साधु", "बंदौ गुरूपद पदुम परागा"।
(xiii) रचना की दृष्टि से संस्कृत, पालि, प्राकृत आदि की भाषा योगात्मक थी। वियोग्यात्मकता अपभ्रंश से आरंभ हुई और आरंभिक हिन्दी बहुत हद तक वियोग्यात्मक हो गई।
इन विशेषताओं को समझने के लिए कबीर, विद्यापति, और अन्य मध्यकालीन कवियों की रचनाओं का अध्ययन सहायक हो सकता है। उदाहरण के लिए, कबीर के दोहे और विद्यापति के पदों में इन भाषाई विशेषताओं का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है।
Conclusion
आरंभिक हिन्दी की प्रमुख विशेषताओं में अपभ्रंश से ध्वनियों का विकास, अरबी-फारसी शब्दों का समावेश, और संयुक्त स्वर का प्रयोग शामिल है। महाप्राण व्यंजन जैसे न्ह, म्ह का विकास हुआ। विदेशी भाषाओं के प्रभाव से क, ख, ग, ज़, फ़ ध्वनियाँ प्रचलित हुईं। क्रिया रूपों की जटिलता कम हुई और चार लकार प्रमुख रहे। पदक्रम निश्चित नहीं था, जैसे "कहे कबीर सुनो भाई साधु"। भाषा वियोग्यात्मक हो गई। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसे भाषा विकास का महत्वपूर्ण चरण माना।