Introduction
आरंभिक हिन्दी तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी की भाषा है, जो अपभ्रंश और अवहट्ट के बाद विकसित हुई। इसमें 'स', 'श', 'ष' के स्थान पर 'स' का प्रयोग, ण व्यंजन का अधिक उपयोग, और क्षतिपूरक दीर्धीकरण प्रमुख थे। ड़ और ढ़ का विकास हुआ, और नपुंसक लिंग समाप्त हो गया। यह भाषा नियोगात्मक बन रही थी, और शब्द क्रम निश्चित होने लगा था। ध्वनियों में संयुक्त स्वर का प्रचलन बढ़ा, और विशेषणों के लिंग-परिवर्तन होने लगे।
Explanation
आरंभिक हिंदी की प्रमुख विशेषताओं को समझने के लिए हमें उस समय के भाषाई विकास और साहित्यिक योगदानों पर ध्यान देना होगा। इस काल में हिंदी भाषा का स्वरूप धीरे-धीरे विकसित हो रहा था और यह कई भाषाई परिवर्तनों से गुजर रही थी।
1. ध्वन्यात्मक परिवर्तन:
○ 'स', 'श', और 'ष' के स्थान पर 'स' का प्रयोग किया जाता था। उदाहरण के लिए, 'संसार' को 'संसार' ही कहा जाता था।
○ 'ण' व्यंजन का अधिक इस्तेमाल किया गया। जैसे 'कर्ण' को 'कण' कहा जाता था।
2. क्षतिपूरक दीर्धीकरण:
○ संयुक्त व्यंजनों का विकास हुआ और द्वित्व में केवल एक व्यंजन में स्वर बढ़ गया। जैसे 'पृष्ठ' से 'पीठ', 'पर्ण' से 'पान'।
3. नए व्यंजनों का विकास:
○ अपभ्रंश में 'ड़' और 'ढ़' व्यंजन नहीं थे, पर आरंभिक हिंदी में इनका विकास हुआ।
4. लिंग परिवर्तन:
○ अपभ्रंश का नपुंसक लिंग समाप्त हो गया और आरंभिक हिंदी में दो ही लिंग रह गए।
5. शब्द क्रम:
○ आरंभिक हिंदी में शब्द क्रम - कर्ता-कर्म-क्रिया निश्चित होने लगा था।
6. संयुक्त स्वर:
○ संयुक्त स्वर जैसे ऐ, औ, आई, इया आदि का प्रचलन बढ़ा।
7. स्वर परिवर्तन:
○ कुछ स्वरों का ह्रस्वीकरण और कुछ का दीर्धीकरण हुआ। जैसे 'दीपावली' से 'दिवारी', 'मनुष्य' से 'मानुख'।
8. विशेषणों का परिवर्तन:
○ संज्ञा के अनुसार विशेषणों के लिंग वचन इत्यादि परिवर्तित होने लगे। उदाहरण के लिए, 'पीतवसन' से 'पीरोवसन'।
इस काल के साहित्य में कई महत्वपूर्ण रचनाएँ और कवि हुए जिन्होंने हिंदी भाषा के विकास में योगदान दिया।
● कबीर: कबीर की रचनाओं में भाषा की सरलता और स्पष्टता देखने को मिलती है। उनकी साखियों में भाषा का सहज प्रवाह मिलता है। उदाहरण: "साधो, यह मुरदों का गाँव।"
● विद्यापति: विद्यापति की रचनाओं में मैथिली और हिंदी का मिश्रण मिलता है। उनकी कविताओं में प्रेम और भक्ति का अद्भुत संगम है।
● अमीर खुसरो: खुसरो की रचनाओं में हिंदी और फारसी का मिश्रण मिलता है। उनकी पहेलियाँ और मुकरियाँ आज भी प्रसिद्ध हैं। उदाहरण: "खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।"
इन साहित्यकारों ने आरंभिक हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उनकी रचनाएँ आज भी हिंदी साहित्य के अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
1. ध्वन्यात्मक परिवर्तन:
○ 'स', 'श', और 'ष' के स्थान पर 'स' का प्रयोग किया जाता था। उदाहरण के लिए, 'संसार' को 'संसार' ही कहा जाता था।
○ 'ण' व्यंजन का अधिक इस्तेमाल किया गया। जैसे 'कर्ण' को 'कण' कहा जाता था।
2. क्षतिपूरक दीर्धीकरण:
○ संयुक्त व्यंजनों का विकास हुआ और द्वित्व में केवल एक व्यंजन में स्वर बढ़ गया। जैसे 'पृष्ठ' से 'पीठ', 'पर्ण' से 'पान'।
3. नए व्यंजनों का विकास:
○ अपभ्रंश में 'ड़' और 'ढ़' व्यंजन नहीं थे, पर आरंभिक हिंदी में इनका विकास हुआ।
4. लिंग परिवर्तन:
○ अपभ्रंश का नपुंसक लिंग समाप्त हो गया और आरंभिक हिंदी में दो ही लिंग रह गए।
5. शब्द क्रम:
○ आरंभिक हिंदी में शब्द क्रम - कर्ता-कर्म-क्रिया निश्चित होने लगा था।
6. संयुक्त स्वर:
○ संयुक्त स्वर जैसे ऐ, औ, आई, इया आदि का प्रचलन बढ़ा।
7. स्वर परिवर्तन:
○ कुछ स्वरों का ह्रस्वीकरण और कुछ का दीर्धीकरण हुआ। जैसे 'दीपावली' से 'दिवारी', 'मनुष्य' से 'मानुख'।
8. विशेषणों का परिवर्तन:
○ संज्ञा के अनुसार विशेषणों के लिंग वचन इत्यादि परिवर्तित होने लगे। उदाहरण के लिए, 'पीतवसन' से 'पीरोवसन'।
इस काल के साहित्य में कई महत्वपूर्ण रचनाएँ और कवि हुए जिन्होंने हिंदी भाषा के विकास में योगदान दिया।
● कबीर: कबीर की रचनाओं में भाषा की सरलता और स्पष्टता देखने को मिलती है। उनकी साखियों में भाषा का सहज प्रवाह मिलता है। उदाहरण: "साधो, यह मुरदों का गाँव।"
● विद्यापति: विद्यापति की रचनाओं में मैथिली और हिंदी का मिश्रण मिलता है। उनकी कविताओं में प्रेम और भक्ति का अद्भुत संगम है।
● अमीर खुसरो: खुसरो की रचनाओं में हिंदी और फारसी का मिश्रण मिलता है। उनकी पहेलियाँ और मुकरियाँ आज भी प्रसिद्ध हैं। उदाहरण: "खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।"
इन साहित्यकारों ने आरंभिक हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उनकी रचनाएँ आज भी हिंदी साहित्य के अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
Conclusion
आरंभिक हिन्दी तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी की भाषा है, जो अपभ्रंश और अवहट्ट के बाद विकसित हुई। इसमें स, श, ष के स्थान पर 'स' का प्रयोग, ण व्यंजन का अधिक उपयोग, और ड़, ढ़ का विकास हुआ। नपुंसक लिंग समाप्त होकर दो लिंग रह गए। संयुक्त स्वर जैसे ऐ, औ का प्रचलन बढ़ा। सरलीकरण और वियोगीकरण की प्रक्रिया ने इसे आधुनिक आर्यभाषा के रूप में विकसित किया। रामचंद्र शुक्ल ने इसे हिन्दी की आरंभिक प्रवृत्तियों का वाहक माना।