आरम्भिक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ। (UPSC 2019, 10 Marks, )

आरम्भिक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ।

Introduction

आरंभिक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ अपभ्रंश और अवहट्ट से विकसित हुईं, जिसमें ध्वनियों का विकास हुआ। उत्क्षिप्त व्यंजन 'ड़', 'ढ़' और महाप्राण रूप जैसे 'न्ह', 'म्ह' हिन्दी की ध्वनियाँ हैं। विदेशी भाषाओं के प्रभाव से 'क़', 'ख', 'ग', 'ज', 'फ़' ध्वनियाँ प्रचलित हुईं। आरंभिक हिन्दी में दो लिंग और दो वचन रह गए, और अधिकतम चार कारक रूप मिलते हैं। यह काल 1000 ई. से 1800 ई. तक माना जाता है।

Explanation

प्रारंभिक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
 1. ध्वनियों का विकास: अपभ्रंश और अवहट्ट में जो ध्वनियाँ थीं, वही ध्वनियाँ हिन्दी में भी पाई जाती थीं, लेकिन कुछ नई ध्वनियों का विकास भी हुआ। जैसे, संयुक्त स्वर ऐ, औ, आई, आउ, इया आदि का प्रयोग प्रारंभिक हिन्दी में होने लगा। उदाहरण के लिए, कबीर की वाणी में "साधो देखो जग बौराना" में 'औ' का प्रयोग मिलता है।
 2. उत्क्षिप्त व्यंजन: 'ड़' और 'ढ़' जैसी ध्वनियाँ हिन्दी की अपनी ध्वनियाँ हैं। ये ध्वनियाँ अपभ्रंश में नहीं थीं।
 3. महाप्राण व्यंजन: कुछ व्यंजनों के महाप्राण रूप विकसित हो गए, जैसे - 'न्ह', 'म्ह', 'ल्ह' आदि।
 4. विदेशी शब्दों का समावेश: अपभ्रंश में अरबी-फारसी-तुर्की शब्दों की संख्या सीमित थी, लेकिन मुसलमानों के शासन के कारण इन भाषाओं से पर्याप्त शब्द हिन्दी में आ गए। अमीर खुसरो की रचनाओं में फारसी शब्दों का प्रभाव देखा जा सकता है।
 5. ऋ का उच्चारण: हिन्दी में 'ऋ' तत्सम शब्दों में ही लिखी जाती है, लेकिन इसका उच्चारण 'रि' की तरह होता है।
 6. ऊष्म वर्ण: 'ष' लेखन में रहा, किन्तु उच्चारण में यह 'श' की तरह उच्चरित होता है।
 7. विदेशी ध्वनियों का प्रभाव: विदेशी भाषाओं के प्रभाव से 'क़', 'ख', 'ग', 'ज', 'फ़' ध्वनियाँ व्यवहृत होने लगीं।
 8. स्वर लोप की प्रवृत्ति: आदिस्वर लोप, मध्य स्वर लोप एवं अन्त्य स्वर लोप की प्रवृत्ति प्रारंभिक हिन्दी में मिलती है। जैसे, 'अभ्यंतर' से 'भीतर', 'चल्ला' से 'कमा'।
 9. द्वित्व का लोप: अपभ्रंश के द्वित्व की जगह केवल एक रह गया और पूर्ववर्ती स्वर में क्षतिपूरक दीर्घता आ गई। जैसे, 'निःश्वास' से 'नीसास'।
 10. लिंग और वचन: प्रारंभिक हिन्दी में दो ही लिंग रह गए - पुल्लिंग और स्त्रीलिंग। नपुंसक लिंग समाप्त हो गया। वचन की संख्या भी मात्र दो रह गई - एकवचन और बहुवचन।
 11. कारक रूप: प्रारंभिक हिन्दी में अधिकतम चार कारक रूप प्राप्त होते हैं।
 इन विशेषताओं को समझने के लिए हिन्दी साहित्य के विभिन्न कवियों और लेखकों की रचनाओं का अध्ययन किया जा सकता है। जैसे, विद्यापति की रचनाओं में मैथिली का प्रभाव और कबीर की साखियों में अवधी का प्रभाव देखा जा सकता है।

Conclusion

आरंभिक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ अपभ्रंश से विकसित हुईं, जिसमें संयुक्त स्वर जैसे ऐ, औ, आई का प्रयोग बढ़ा। उत्क्षिप्त व्यंजन 'ड़', 'ढ़' और महाप्राण व्यंजन 'न्ह', 'म्ह' का विकास हुआ। विदेशी भाषाओं के प्रभाव से अरबी-फारसी शब्दों का समावेश बढ़ा। लिंग और वचन की संख्या घटकर दो रह गई। स्वर लोप की प्रवृत्ति और कारक रूपों की संख्या चार तक सीमित रही। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे भाषा विकास का महत्वपूर्ण चरण माना।