Introduction
अवहट्ठ भाषा, अपभ्रंश का विकृत रूप है, जो 900-1100 ई. के बीच विकसित हुई। यह आधुनिक भारतीय भाषाओं और अपभ्रंश के बीच की संक्रमणकालीन भाषा है। डॉ. तगारे के अनुसार, इसमें कर्ता की 'ए' विभक्ति प्रमुख है। अवहट्ठ की व्याकरणिक संरचना में संज्ञा, लिंग, वचन, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, और काल की व्यवस्थाएँ शामिल हैं, जो अपभ्रंश और हिंदी के बीच की स्थिति को दर्शाती हैं।
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Introduction
अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएँ अपभ्रंश की ध्वनियों से प्रभावित हैं, जिसमें नई ध्वनियाँ जैसे और शामिल हैं। तत्सम शब्दों के प्रयोग से और ध्वनियाँ प्रचलित हुईं। पूर्वी अवहट्ट में 'ज' ध्वनि का प्रयोग मिलता है। संस्कृत के तत्सम शब्दों को सरल बनाने के लिए स्वर का आगम होता है। अवहट्ट में भूतकालिक कृदन्त प्रत्यय 'अल' और भविष्यतकाल बोधक प्रत्यय का भी प्रयोग होता है।
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Introduction
अवहट्ट मध्यकालीन आर्य भाषा के विकास में अपभ्रंश के बाद की अनगढ़ ग्राम्य भाषा है, जिसे विद्वानों ने अवहट्ट की संज्ञा दी। इसका काल 14वीं शताब्दी तक माना जाता है। इसमें अपभ्रंश की ध्वनियाँ, जैसे उकार बहुलता और अनुस्वार प्रधानता, विद्यमान हैं। हेमचन्द्र के समय में विभक्तियों का लोप कम था, लेकिन संदेश रासक में निर्विभक्तिक पदों का प्रचलन बढ़ा। अवहट्ट में सहायक क्रियाओं और परसर्गों का प्रयोग हिंदी की वियोगात्मकता के बीज अंकुरित करता है।
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Introduction
अवहट्ट भाषा मध्यकालीन भारत की एक महत्वपूर्ण अपभ्रंश भाषा थी, जो 10वीं से 14वीं शताब्दी के बीच प्रचलित रही। इसे रामचंद्र शुक्ल ने 'अपभ्रंश का अंतिम चरण' कहा है। इस भाषा का उपयोग विशेष रूप से धार्मिक और साहित्यिक ग्रंथों में हुआ। हेमचंद्र और विद्यापति जैसे विद्वानों ने अवहट्ट में रचनाएँ कीं। इसकी विशेषता है कि यह आधुनिक भारतीय भाषाओं के विकास में एक सेतु का कार्य करती है।
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