अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएँ। (UPSC 2015, 10 Marks, )

Theme: अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएँ Where in Syllabus: (Linguistics)
अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएँ।

Introduction

अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएँ अपभ्रंश की ध्वनियों से प्रभावित हैं, जिसमें नई ध्वनियाँ जैसे और शामिल हैं। तत्सम शब्दों के प्रयोग से और ध्वनियाँ प्रचलित हुईं। पूर्वी अवहट्ट में 'ज' ध्वनि का प्रयोग मिलता है। संस्कृत के तत्सम शब्दों को सरल बनाने के लिए स्वर का आगम होता है। अवहट्ट में भूतकालिक कृदन्त प्रत्यय 'अल' और भविष्यतकाल बोधक प्रत्यय का भी प्रयोग होता है।

अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएँ

अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
 (i) अवहट्ट में अपभ्रंश की ध्वनियाँ मिलती हैं। इसमें दो नई ध्वनियाँ 'ऐ' और 'औ' आ गईं। उदाहरण के लिए, "रहइ" से "रहै", "चउहट्ट" से "चौहट"।
 (ii) तत्सम शब्दों के प्रयोग के कारण 'ऋ' एवं 'श' ध्वनियाँ प्रचलन में आ गई थीं। पूर्वी अवहट्ट में 'ज' ध्वनि भी मिलने लगती है। जैसे "सञ", "हिञ"।
 (iii) पूर्वी अवहट्ट में 'इ' ध्वनि 'ऎ' में बदल जाती है। जैसे "दइ" से "दऐ", "करावइ" से "करावऐ"।
 (iv) अवहट्ट में 'न' ध्वनि 'ल' में और 'ल' ध्वनि 'न' में बदल जाती है। जैसे "इनाम" से "इलाभ", "लहिअ" से "नहिअ"।
 (v) संस्कृत के तत्सम या अर्द्धतत्सम शब्द संयुक्ताक्षर के बीच स्वर का आगम कर सरल हो जाते हैं। जैसे "मध्यक" से "मधक", "शुक्ल" से "सुकिल"।
 (vi) क्षतिपूर्ति दीर्घता की प्रवृत्ति। जैसे "कज्जल" से "काजर", "लग्गि" से "लागि"।
 (vii) अवहट्ट में दो ही वचन मिलते हैं - एकवचन और बहुवचन। पूर्वी अवहट्ट में 'न्हि' अथवा 'न्ह' प्रत्यय जोड़कर बहुवचन के रूप बनाए जाते थे। जैसे "यवराजन्हि", "नगरन्ह"।
 (viii) अवहट्ट में सारे कारकीय रूप निर्विक्तिक बनने लगे। जैसे "अहिर गोरू बाग मेलब" (अहीर गाय को बाग में ले गया।)
 (ix) अवहट्ट में सर्वनामों के रूप और सहज हो गए। एकवचन: "मैं", "हौं"; बहुवचन: "अम्हे"। एकवचन: "तुहूँ", "तै"; बहुवचन: "तुम्ह"।
 (x) अवहट्ट में सार्वनामिक विशेषण हैं - "अइस", "जइस", "अस", "जस", "एत्ता", "जित्ता"।
 (xi) अवहट्ट में भूतकालिक कृदन्त प्रत्यय 'अल' मिलने लगा। जैसे "पथिक जने मार्गानुसंधान करल", "भ्रमर पुष्पोद्देशे चलल" (वर्ण-रत्नाकर)।
 (xii) अवहट्ट में भविष्यतकाल बोधक 'व' प्रत्यय मिलता है। जैसे "पुरान देखब"।
 इन विशेषताओं के माध्यम से अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना को समझा जा सकता है। हिंदी साहित्य के विद्वान जैसे रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी भाषा के विकास और परिवर्तन पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। उदाहरण के लिए, हजारीप्रसाद द्विवेदी की पुस्तक "हिंदी साहित्य का इतिहास" में भाषा के विकास के विभिन्न चरणों का वर्णन मिलता है।

Conclusion

अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएँ अपभ्रंश की ध्वनियों से प्रभावित हैं, जिसमें और जैसी नई ध्वनियाँ शामिल हैं। तत्सम शब्दों के प्रयोग से और ध्वनियाँ प्रचलित हुईं। पूर्वी अवहट्ट में ध्वनि में बदल जाती है। और ध्वनियों का परस्पर परिवर्तन होता है। संस्कृत के तत्सम शब्दों में स्वर का आगम होता है। अवहट्ट में केवल एकवचन और बहुवचन मिलते हैं। भूतकालिक कृदन्त प्रत्यय 'अल' और भविष्यतकाल बोधक प्रत्यय का प्रयोग होता है।