अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना का स्वरूप। (UPSC 2021, 10 Marks, )

Theme: अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना का विश्लेषण Where in Syllabus: (Linguistics)
अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना का स्वरूप।

Introduction

अवहट्ठ भाषा, अपभ्रंश का विकृत रूप है, जो 900-1100 ई. के बीच विकसित हुई। यह आधुनिक भारतीय भाषाओं और अपभ्रंश के बीच की संक्रमणकालीन भाषा है। डॉ. तगारे के अनुसार, इसमें कर्ता की 'ए' विभक्ति प्रमुख है। अवहट्ठ की व्याकरणिक संरचना में संज्ञा, लिंग, वचन, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, और काल की व्यवस्थाएँ शामिल हैं, जो अपभ्रंश और हिंदी के बीच की स्थिति को दर्शाती हैं।

अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना का विश्लेषण

अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना का स्वरूप हिंदी साहित्य के विकास में एक महत्वपूर्ण चरण है। यह भाषा अपभ्रंश और आधुनिक हिंदी के बीच की संक्रमणकालीन भाषा मानी जाती है। अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
 1. संज्ञा तथा कारक व्यवस्था:
         ○ अवहट्ट में संज्ञा शब्द 'अकरांत' और 'स्वरांत' होने लगे।
         ○ विभक्तियों का प्रयोग कम हो गया और निर्विभक्तिक या लुप्तविभक्तिक का प्रयोग बढ़ गया।
         ○ विभक्तियों और परसर्गों का संयुक्त प्रयोग भी होने लगा। उदाहरण के लिए, "युवराजन्हि मांझ तान्हि केरो पुत्र"।
 2. लिंग संरचना:
         ○ अवहट्ट में पुल्लिंग और स्त्रीलिंग दो ही लिंग थे, जैसे अपभ्रंश में थे।
 3. वचन व्यवस्था:
         ○ द्विवचन का लोप हो गया और बहुवचन के लिए 'न्ह' या 'न्हि' परसर्ग का प्रयोग होता था, जैसे "हाथन्ह"।
 4. सर्वनाम व्यवस्था:
         ○ अवहट्ट में कई नए सर्वनामों का प्रयोग हुआ, जैसे:
           ○ उत्तम पुरुष: मैं, हौं, मेरा
           ○ मध्यम पुरुष: तुम, तुम्ह, तुम्हार
           ○ अन्य पुरुष: वह, अन्य
 5. विशेषण व्यवस्था:
         ○ विशेषणों का प्रयोग विशेष्य के लिंग और वचन के अनुसार होने लगा। संख्या वाचक विशेषण जैसे "सात-दस" और सार्वनामिक विशेषण जैसे "अइस, ऐसो" का प्रयोग होने लगा।
 6. क्रिया व्यवस्था:
         ○ कृदंतों के सहारे क्रिया निर्माण की परम्परा आरंभ हुई। धातु रूप जैसे "चल", "उठ" और भूतकालिक कृदंत जैसे "मेल", "कहल" का प्रयोग होने लगा।
 7. काल संरचना:
         ○ वर्तमान काल: "जात", "करत", "करन्ता", "करन्ते"
         ○ भूत काल: "ल" रूप जैसे "चलल"
         ○ भविष्य काल: "ब" रूप जैसे "खाइब" और "ह" रूप जैसे "करहि"
 अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना में अपभ्रंश और हिंदी के बीच की अवस्थाओं का समावेश है। इसमें दो अतिरिक्त स्वर 'ए' और 'औ' का प्रयोग होने लगा और स्त्रीलिंग शब्द 'आकारांत' होने लगे, जैसे "शिक्षा" से "सीख"।
 यह संरचना हिंदी साहित्य के विकास में एक महत्वपूर्ण चरण है और इसे समझने के लिए हिंदी साहित्य के विद्वानों जैसे डॉ. तगारे के विचारों का अध्ययन किया जा सकता है।

Conclusion

अवहट्ठ भाषा, अपभ्रंश का परवर्ती रूप, 900-1100 ई. के बीच विकसित हुई। यह संस्कृत के सरलीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा है, जो आधुनिक भारतीय भाषाओं और अपभ्रंश के बीच की संक्रमणकालीन भाषा है। इसके व्याकरणिक तत्वों में संज्ञा, लिंग, वचन, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, और काल शामिल हैं। डॉ. तगारे के अनुसार, कर्ता की 'ए' विभक्ति इसकी प्रमुख विशेषता है। अवहट्ठ में प्रेरणार्थक और सहायक क्रियाओं का विकास हुआ, जो हिंदी के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।