अवहट्ठ का सामान्य परिचय दीजिए। (UPSC 2022, 15 Marks, )

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अवहट्ठ का सामान्य परिचय दीजिए।

अवहट्ठ भाषा का सामान्य परिचय

अवहट्ठ का सामान्य परिचय निम्नलिखित बिंदुओं में दिया जा सकता है:
 1. अवहट्ठ की उत्पत्ति और विकास: अवहट्ठ अपभ्रंश का परवर्ती रूप है, जिसे 'अपभ्रंश का अपभ्रंश' या 'परवर्ती अपभ्रंश' कहा जाता है। यह अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के बीच की भाषा है। इसका विकास 900 ई. से 1100 ई. के बीच हुआ और साहित्य में इसका प्रयोग 14वीं सदी तक होता रहा।
 2. भाषाई विशेषताएँ: अवहट्ठ की शब्दावली अपभ्रंश से तीन प्रकार से अलग है:
         ○ विदेशी शब्दों का प्रयोग जैसे दूआ (दुआ), दरिगाह (दरगाह), देवान (दीवान)।
         ○ देशी शब्दों का अधिक इस्तेमाल जैसे लोर (आंसू)।
         ○ तत्सम शब्दों का प्रयोग।
 3. प्रमुख रचनाकार: अवहट्ठ भाषा के प्रमुख रचनाकारों में अब्दुर रहमान (संदेश रासक), दामोदर पंडित (उक्ति-व्यक्ति प्रकरण), ज्योतिरीश्वर ठाकुर (वर्ण रत्नाकर), विद्यापति (कीर्तिलता) आदि शामिल हैं। ज्योतिरीश्वर ठाकुर ने अपनी पुस्तक वर्ण रत्नाकर में 1325 ईसवी में 'अवहट्ट' शब्द का सबसे पहला इस्तेमाल किया था।
 4. विद्यापति का योगदान: विद्यापति ने अपनी रचना कीर्तिलता में अवहट्ठ भाषा का प्रयोग किया और इसे 'देसिल बअना' भी कहा। उन्होंने लिखा: "देसिल बअना सब जन मिट्ठा, तं जैसन जम्पों अवहट्ठा", जिसका अर्थ है कि देशी वचन सबको मीठा लगता है, इसलिए वैसे ही अवहट्ठ में लिखता हूं।
 5. भाषाई प्रभाव: अवहट्ठ हिंदी क्षेत्रीय बोलियों के अधिक करीब है। यह भाषा उत्तर भारत में राजस्थान से असम तक काव्यभाषा का रूप ले चुकी थी। इसके विकास के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों की बोलियों का भी विकास हो रहा था और बाद में उन बोलियों में भी साहित्य लिखा जाने लगा।
 6. डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी का दृष्टिकोण: डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी के अनुसार, अवहट्ठ मध्यदेश के अलावा बंगाल आदि प्रदेशों में भी काव्यभाषा के रूप में इस्तेमाल की जाती थी।
 इन बिंदुओं के माध्यम से अवहट्ठ का सामान्य परिचय प्रस्तुत किया जा सकता है, जो हिंदी साहित्य के विकास में एक महत्वपूर्ण चरण है।