Q 2(c). संत साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली के स्वरूप की सोदाहरण चर्चा कीजिए।
(UPSC 2025, 15 Marks, 200 Words)
Theme:
खड़ी बोली का संत साहित्य
Where in Syllabus:
(Hindi Literature)
Discuss the form of Khari Boli used in saint literature with examples. (संत साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली के स्वरूप की सोदाहरण चर्चा कीजिए।)
Q 2(c). संत साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली के स्वरूप की सोदाहरण चर्चा कीजिए।
(UPSC 2025, 15 Marks, 200 Words)
Theme:
खड़ी बोली का संत साहित्य
Where in Syllabus:
(Hindi Literature)
Discuss the form of Khari Boli used in saint literature with examples. (संत साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली के स्वरूप की सोदाहरण चर्चा कीजिए।)
Introduction
संत साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का स्वरूप भारतीय साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कबीर, तुलसीदास, और सूरदास जैसे संत कवियों ने इसे अपनी रचनाओं में अपनाया, जिससे यह जनमानस के करीब पहुंची। खड़ी बोली की सरलता और स्पष्टता ने इसे व्यापक रूप से स्वीकार्य बनाया। उदाहरण के लिए, कबीर के दोहे और तुलसीदास की रामचरितमानस में खड़ी बोली का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
खड़ी बोली का संत साहित्य
● खड़ी बोली का उद्भव:
○ खड़ी बोली का विकास 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच हुआ। यह हिंदी भाषा की एक प्रमुख बोली है जो उत्तर भारत में व्यापक रूप से बोली जाती है।
● उदाहरण: संत कबीर और संत सूरदास ने अपने साहित्य में खड़ी बोली का प्रयोग किया।
● संत साहित्य में खड़ी बोली का प्रयोग:
○ संत साहित्य में खड़ी बोली का प्रयोग सरल और सहज भाषा के रूप में किया गया है, जिससे आम जनता तक धार्मिक और सामाजिक संदेश पहुँच सके।
● उदाहरण: कबीर के दोहे जैसे "साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।"
● भाषाई विशेषताएँ:
○ खड़ी बोली में सरलता और स्पष्टता होती है, जो इसे संत साहित्य के लिए उपयुक्त बनाती है।
○ इसमें तत्सम और तद्भव शब्दों का संतुलित प्रयोग होता है।
● संत साहित्य के प्रमुख रचनाकार:
● कबीरदास: उनके दोहे और साखियाँ खड़ी बोली में लिखी गई हैं, जो समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वासों पर प्रहार करती हैं।
● सूरदास: उन्होंने अपनी रचनाओं में ब्रज भाषा के साथ खड़ी बोली का भी प्रयोग किया है।
● सामाजिक और धार्मिक संदेश:
○ खड़ी बोली का प्रयोग संत साहित्य में सामाजिक सुधार और धार्मिक जागरूकता फैलाने के लिए किया गया।
● उदाहरण: "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।"
● लोकप्रियता और प्रभाव:
○ खड़ी बोली की सरलता और स्पष्टता ने इसे संत साहित्य में लोकप्रिय बनाया और यह भाषा आज भी हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
○ संत साहित्य के माध्यम से खड़ी बोली ने भारतीय समाज में सामाजिक समरसता और धार्मिक सहिष्णुता का संदेश फैलाया।
○ खड़ी बोली का विकास 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच हुआ। यह हिंदी भाषा की एक प्रमुख बोली है जो उत्तर भारत में व्यापक रूप से बोली जाती है।
● उदाहरण: संत कबीर और संत सूरदास ने अपने साहित्य में खड़ी बोली का प्रयोग किया।
● संत साहित्य में खड़ी बोली का प्रयोग:
○ संत साहित्य में खड़ी बोली का प्रयोग सरल और सहज भाषा के रूप में किया गया है, जिससे आम जनता तक धार्मिक और सामाजिक संदेश पहुँच सके।
● उदाहरण: कबीर के दोहे जैसे "साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।"
● भाषाई विशेषताएँ:
○ खड़ी बोली में सरलता और स्पष्टता होती है, जो इसे संत साहित्य के लिए उपयुक्त बनाती है।
○ इसमें तत्सम और तद्भव शब्दों का संतुलित प्रयोग होता है।
● संत साहित्य के प्रमुख रचनाकार:
● कबीरदास: उनके दोहे और साखियाँ खड़ी बोली में लिखी गई हैं, जो समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वासों पर प्रहार करती हैं।
● सूरदास: उन्होंने अपनी रचनाओं में ब्रज भाषा के साथ खड़ी बोली का भी प्रयोग किया है।
● सामाजिक और धार्मिक संदेश:
○ खड़ी बोली का प्रयोग संत साहित्य में सामाजिक सुधार और धार्मिक जागरूकता फैलाने के लिए किया गया।
● उदाहरण: "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।"
● लोकप्रियता और प्रभाव:
○ खड़ी बोली की सरलता और स्पष्टता ने इसे संत साहित्य में लोकप्रिय बनाया और यह भाषा आज भी हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
○ संत साहित्य के माध्यम से खड़ी बोली ने भारतीय समाज में सामाजिक समरसता और धार्मिक सहिष्णुता का संदेश फैलाया।
Conclusion
संत साहित्य में खड़ी बोली का स्वरूप सरल और सहज है, जो जनमानस को सीधे प्रभावित करता है। कबीर, तुलसीदास और रैदास जैसे संतों ने इसे अपनाकर भक्ति और सामाजिक सुधार के संदेश दिए। खड़ी बोली की विशेषता इसकी स्पष्टता और संप्रेषणीयता है। रामचंद्र शुक्ल ने इसे जनभाषा का दर्जा दिया। आगे बढ़ते हुए, खड़ी बोली का प्रयोग साहित्य और संवाद में बढ़ाना चाहिए ताकि यह सांस्कृतिक धरोहर संरक्षित रहे।