अपभ्रंश और प्रारम्भिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में प्रमुख अंतर।
(UPSC 2020, 10 Marks, )
अपभ्रंश और प्रारम्भिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में प्रमुख अंतर।
अपभ्रंश और प्रारम्भिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में प्रमुख अंतर।
(UPSC 2020, 10 Marks, )
Introduction
अपभ्रंश और प्रारम्भिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में महत्वपूर्ण अंतर हैं। अपभ्रंश में अरबी, फारसी, और तुर्की शब्दों की संख्या सीमित थी, जबकि प्रारम्भिक हिन्दी में इन भाषाओं से अधिक शब्द आए। प्रारम्भिक हिन्दी में केवल दो लिंग (स्त्रीलिंग और पुलिंग) और दो वचन (एकवचन और बहुवचन) रह गए। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, अपभ्रंश में क्रियारूपों की जटिलता अधिक थी, जबकि हिन्दी में चार लकार प्रमुख रहे। विद्यापति और कबीर जैसे कवियों के कार्यों में पदक्रम की विविधता दिखती है।
Explanation
अपभ्रंश और प्रारम्भिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में कई महत्वपूर्ण अंतर हैं, जो भाषा के विकास और परिवर्तन को दर्शाते हैं।
1. शब्दभंडार में विदेशी शब्दों का प्रभाव:
○ अपभ्रंश में अरबी, फारसी और तुर्की के शब्दों की संख्या सीमित थी, जबकि प्रारम्भिक हिन्दी में मुस्लिम शासन के कारण इन भाषाओं से अधिक शब्द आए।
○ उदाहरण: "कबीर" की रचनाओं में फारसी शब्दों का प्रयोग मिलता है, जैसे "दरवेश"।
2. लिंग और वचन:
○ प्रारम्भिक हिन्दी में केवल दो लिंग (स्त्रीलिंग और पुलिंग) रह गए, जबकि अपभ्रंश में नपुंसक लिंग भी था।
○ वचन की संख्या भी दो रह गई - एकवचन और बहुवचन।
3. कारक और विभक्ति:
○ प्रारम्भिक हिन्दी में अधिकतम चार कारक रूप मिलते हैं और परसर्ग का प्रयोग आवश्यक हो गया।
○ उदाहरण: "विद्यापति" की रचनाओं में विभक्ति के रूप में 'हि' का प्रयोग मिलता है।
4. क्रिया रूप और लकार:
○ अपभ्रंश में क्रिया रूपों की जटिलता और लकारों की विविधता अधिक थी। हिन्दी में चार मुख्य लकार रह गए - वर्तमान, भूत, भविष्यत् और आज्ञार्थ।
○ उदाहरण: "तुलसीदास" की रचनाओं में "गयो", "गयी" जैसे भूतकालिक क्रिया रूप मिलते हैं।
5. पुरुषवाची सर्वनाम:
○ अपभ्रंश के पुरुषवाची सर्वनामों में उच्चारण भेद हुआ, लेकिन मूल प्रकृति सुरक्षित रही।
○ उदाहरण: "सो", "से", "ते" जैसे सर्वनाम "सूरदास" की रचनाओं में मिलते हैं।
6. विशेषण और क्रिया विशेषण:
○ प्रारम्भिक हिन्दी में विशेषण के अंत में 'अती' प्रत्यय मिलता है।
○ उदाहरण: "मीरा" की रचनाओं में "सुंदरती" जैसे विशेषण मिलते हैं।
7. पदक्रम:
○ प्रारम्भिक हिन्दी में पदक्रम निश्चित नहीं था, जबकि दक्खिनी हिन्दी में संज्ञा-क्रिया-कर्म का निश्चित क्रम मिलता है।
○ उदाहरण: "कबीर" की रचनाओं में "कहै कबीर सुनौ भाई साधी" जैसे वाक्य संरचना मिलती है।
इन बिंदुओं के माध्यम से अपभ्रंश और प्रारम्भिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में अंतर स्पष्ट होता है, जो भाषा के विकास की प्रक्रिया को दर्शाता है।
1. शब्दभंडार में विदेशी शब्दों का प्रभाव:
○ अपभ्रंश में अरबी, फारसी और तुर्की के शब्दों की संख्या सीमित थी, जबकि प्रारम्भिक हिन्दी में मुस्लिम शासन के कारण इन भाषाओं से अधिक शब्द आए।
○ उदाहरण: "कबीर" की रचनाओं में फारसी शब्दों का प्रयोग मिलता है, जैसे "दरवेश"।
2. लिंग और वचन:
○ प्रारम्भिक हिन्दी में केवल दो लिंग (स्त्रीलिंग और पुलिंग) रह गए, जबकि अपभ्रंश में नपुंसक लिंग भी था।
○ वचन की संख्या भी दो रह गई - एकवचन और बहुवचन।
3. कारक और विभक्ति:
○ प्रारम्भिक हिन्दी में अधिकतम चार कारक रूप मिलते हैं और परसर्ग का प्रयोग आवश्यक हो गया।
○ उदाहरण: "विद्यापति" की रचनाओं में विभक्ति के रूप में 'हि' का प्रयोग मिलता है।
4. क्रिया रूप और लकार:
○ अपभ्रंश में क्रिया रूपों की जटिलता और लकारों की विविधता अधिक थी। हिन्दी में चार मुख्य लकार रह गए - वर्तमान, भूत, भविष्यत् और आज्ञार्थ।
○ उदाहरण: "तुलसीदास" की रचनाओं में "गयो", "गयी" जैसे भूतकालिक क्रिया रूप मिलते हैं।
5. पुरुषवाची सर्वनाम:
○ अपभ्रंश के पुरुषवाची सर्वनामों में उच्चारण भेद हुआ, लेकिन मूल प्रकृति सुरक्षित रही।
○ उदाहरण: "सो", "से", "ते" जैसे सर्वनाम "सूरदास" की रचनाओं में मिलते हैं।
6. विशेषण और क्रिया विशेषण:
○ प्रारम्भिक हिन्दी में विशेषण के अंत में 'अती' प्रत्यय मिलता है।
○ उदाहरण: "मीरा" की रचनाओं में "सुंदरती" जैसे विशेषण मिलते हैं।
7. पदक्रम:
○ प्रारम्भिक हिन्दी में पदक्रम निश्चित नहीं था, जबकि दक्खिनी हिन्दी में संज्ञा-क्रिया-कर्म का निश्चित क्रम मिलता है।
○ उदाहरण: "कबीर" की रचनाओं में "कहै कबीर सुनौ भाई साधी" जैसे वाक्य संरचना मिलती है।
इन बिंदुओं के माध्यम से अपभ्रंश और प्रारम्भिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में अंतर स्पष्ट होता है, जो भाषा के विकास की प्रक्रिया को दर्शाता है।
Conclusion
अपभ्रंश और प्रारंभिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में प्रमुख अंतर स्वर संकोचन, लिंग, वचन, और कारक रूपों में देखा जाता है। अपभ्रंश में अरबी, फारसी, तुर्की शब्द सीमित थे, जबकि प्रारंभिक हिन्दी में इनकी संख्या बढ़ी। अपभ्रंश में क्रियारूपों की जटिलता अधिक थी, जबकि हिन्दी में चार लकार प्रमुख रहे। विद्यापति और कबीर जैसे कवियों के पदक्रम में भिन्नता दिखती है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, भाषा का विकास समाज के सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तनों से प्रभावित होता है।