अपभ्रंश और अवहट्ट का पारस्परिक सम्बन्ध।
(UPSC 2014, 10 Marks, )
अपभ्रंश और अवहट्ट का पारस्परिक सम्बन्ध।
अपभ्रंश और अवहट्ट का पारस्परिक सम्बन्ध।
(UPSC 2014, 10 Marks, )
Introduction
अपभ्रंश और अवहट्ट मध्यकालीन आर्यभाषा के विकास में महत्वपूर्ण चरण हैं। विद्वानों ने अवहट्ट को अपभ्रंश के बाद की भाषा माना है। दोनों में उच्चारण, व्याकरण और शब्दावली के स्तर पर गहरा संबंध है। कुछ विद्वानों ने इन्हें एक ही माना है। उच्चारण में स्वर और व्यंजन वर्ण समान हैं, जबकि अवहट्ट में 'ए' और 'औ' नई ध्वनियाँ हैं। व्याकरण में संज्ञा के दो वचन और दो लिंग मिलते हैं, और शब्दावली में तदभव शब्द अधिक पाए जाते हैं।
Explanation
अपभ्रंश और अवहट्ट के पारस्परिक संबंध को समझने के लिए हमें इन दोनों भाषाओं के उच्चारण, व्याकरण और शब्दावली के स्तर पर समानताओं और भिन्नताओं को देखना होगा।
1. उच्चारण के स्तर पर संबंध:
अपभ्रंश और अवहट्ट में स्वर और व्यंजन वर्णों में समानता पाई जाती है। उदाहरण के लिए, 'ऋ' का उच्चारण दोनों में 'अ', 'इ', 'उ' या 'ए' हो गया है। अवहट्ट में 'ए' और 'औ' दो नई ध्वनियाँ हैं। अनुनासिकता अपभ्रंश की विशेष प्रवृत्ति है जो अवहट्ट में अत्यधिक बढ़ गई है।
2. व्याकरण के स्तर पर संबंध:
दोनों भाषाओं में संज्ञा के दो वचन (एकवचन और बहुवचन) और दो लिंग (पुल्लिंग और स्त्रीलिंग) मिलते हैं। सर्वनाम में सरलीकरण की प्रवृत्ति दोनों में पाई जाती है।
3. शब्दावली के स्तर पर संबंध:
अपभ्रंश और अवहट्ट में तत्सम शब्दों की अपेक्षा तदभव शब्द अधिक पाए जाते हैं। देशज और विदेशी शब्द भी दोनों भाषाओं में मिलते हैं। उदाहरण के लिए, 'पुहुभी' शब्द दोनों ही भाषाओं में मिलता है।
4. साहित्यिक उदाहरण:
अपभ्रंश और अवहट्ट के साहित्यिक उदाहरणों में 'सरहपा' और 'कन्हपा' जैसे सिद्ध कवियों की रचनाएँ आती हैं। इनकी रचनाओं में भाषा की सरलता और अनुनासिकता की प्रवृत्ति स्पष्ट देखी जा सकती है।
5. विचारक और साहित्यकार:
हिंदी साहित्य के विद्वान जैसे रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपभ्रंश और अवहट्ट के विकास और उनके साहित्यिक योगदान पर गहन अध्ययन किया है।
इन बिंदुओं के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि अपभ्रंश और अवहट्ट के बीच गहरा संबंध है, जो उच्चारण, व्याकरण और शब्दावली के स्तर पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
1. उच्चारण के स्तर पर संबंध:
अपभ्रंश और अवहट्ट में स्वर और व्यंजन वर्णों में समानता पाई जाती है। उदाहरण के लिए, 'ऋ' का उच्चारण दोनों में 'अ', 'इ', 'उ' या 'ए' हो गया है। अवहट्ट में 'ए' और 'औ' दो नई ध्वनियाँ हैं। अनुनासिकता अपभ्रंश की विशेष प्रवृत्ति है जो अवहट्ट में अत्यधिक बढ़ गई है।
2. व्याकरण के स्तर पर संबंध:
दोनों भाषाओं में संज्ञा के दो वचन (एकवचन और बहुवचन) और दो लिंग (पुल्लिंग और स्त्रीलिंग) मिलते हैं। सर्वनाम में सरलीकरण की प्रवृत्ति दोनों में पाई जाती है।
3. शब्दावली के स्तर पर संबंध:
अपभ्रंश और अवहट्ट में तत्सम शब्दों की अपेक्षा तदभव शब्द अधिक पाए जाते हैं। देशज और विदेशी शब्द भी दोनों भाषाओं में मिलते हैं। उदाहरण के लिए, 'पुहुभी' शब्द दोनों ही भाषाओं में मिलता है।
4. साहित्यिक उदाहरण:
अपभ्रंश और अवहट्ट के साहित्यिक उदाहरणों में 'सरहपा' और 'कन्हपा' जैसे सिद्ध कवियों की रचनाएँ आती हैं। इनकी रचनाओं में भाषा की सरलता और अनुनासिकता की प्रवृत्ति स्पष्ट देखी जा सकती है।
5. विचारक और साहित्यकार:
हिंदी साहित्य के विद्वान जैसे रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपभ्रंश और अवहट्ट के विकास और उनके साहित्यिक योगदान पर गहन अध्ययन किया है।
इन बिंदुओं के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि अपभ्रंश और अवहट्ट के बीच गहरा संबंध है, जो उच्चारण, व्याकरण और शब्दावली के स्तर पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
Conclusion
अपभ्रंश और अवहट्ट के बीच गहरा संबंध है, जो उच्चारण, व्याकरण और शब्दावली में परिलक्षित होता है। कुछ विद्वान इन्हें एक ही मानते हैं। उच्चारण में स्वर और व्यंजन समान हैं, लेकिन अवहट्ट में 'ए' और 'औ' नई ध्वनियाँ हैं। व्याकरण में दोनों में दो वचन और दो लिंग मिलते हैं। शब्दावली में तदभव शब्द अधिक हैं। रामचंद्र शुक्ल ने इन भाषाओं के विकास को महत्वपूर्ण माना है। भविष्य में इनकी गहन तुलना से भाषा विकास की समझ बढ़ेगी।