अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ बताइए।
(UPSC 2023, 15 Marks, )
Theme:
अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ
Where in Syllabus:
(Linguistics)
अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ बताइए।
अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ बताइए।
(UPSC 2023, 15 Marks, )
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अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ
Where in Syllabus:
(Linguistics)
अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ बताइए।
Introduction
अपभ्रंश प्राकृतकालीन जन भाषाओं का विकसित रूप है, जो 500 ईस्वी से 1200 ईस्वी के बीच उत्तरी भारत में प्रचलित था। इसकी व्याकरणिक विशेषताओं में स्वर और व्यंजन की विविधता, उकार बहुलता, और अनुनासिकता की प्रवृत्तियाँ शामिल हैं। संस्कृत, प्राकृत के बाद अपभ्रंश का विकास हुआ, जिसमें तद्भव शब्दों की प्रधानता थी। यह भाषा सामाजिक, राजनीतिक, और धार्मिक अनुभवों को व्यक्त करती है।
अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ
अपभ्रंश भाषा की व्याकरणिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. स्वरः
● हस्व स्वर: अ, इ, उ, ए, ओ।
● दीर्घ स्वर: आ, ई, ऊ, ए, ओ (ऐ व औ का पाली में लोप)।
उदाहरण के लिए, "कण्ह" (कृष्ण) और "मितु" (मृत्यु) में स्वर परिवर्तन देखा जा सकता है।
2. 'ऋ' का प्रयोग नहीं मिलता है; 'रि' का प्रयोग चलता रहा।
○ उदाहरण: कृष्ण – कण्ह, मृत्यु - मितु, ऋण - रिण।
3. उकार बहुलताः
○ भाषा में उकार की बहुलता मिलती है; जैसे: मन - मनु, चल - चलु, अंग - अंगु।
4. अनुनासिकताः
○ i. कहीं-कहीं स्वरों के अनुनासिक रूप विकसित हुए हैं। जैसे: चलहि – चलहिं, पक्षी – पखि।
○ ii. कुछ अनुनासिक शब्द अनुनासिकता रहित हैं। जैसे: सिंह - सीह, विंशति – वीस।
○ iii. अकारण अनुनासिक शब्द। जैसे: अक्षु – अंसु, वक्र - वंक।
5. स्वर भक्तिः
○ उदाहरण: प्रदेश – परदेश, क्रिया – किरिया।
6. स्वर लोपः
○ उदाहरण: अरण्य – रण (आदि स्वर लोप), लज्जा – लाज (अन्त्य स्वर लोप)।
7. व्यंजनमालाः
○ व्यंजनमाला में ङ, ञ, न, श, ष का अभाव; 'ट' वर्ग की प्रधानता।
8. अंत्य व्यंजन लुप्त भाषाः
○ उदाहरण: जगत – जग, महान – महा।
9. संयुक्त व्यंजन समाप्तः
○ य, र, ल, व समाप्त। जैसे: चक्र – चक्क, धर्म – धम्म, कर्म – कम्म।
10. तत्सम, तद्भव, देशज-विदेशज सभी प्रकार के शब्द मिलते हैं; तद्भव की संख्या सर्वाधिक है।
○ तुर्कों के आगमन से विदेशी शब्दों के प्रयोग होने लगे।
11. दो ही वचनः
○ अपभ्रंश में दो ही वचन होते हैं – एकवचन और बहुवचन। द्विवचन के सारे शब्द बहुवचन में शामिल हो गए।
इन विशेषताओं के माध्यम से अपभ्रंश भाषा की व्याकरणिक संरचना को समझा जा सकता है। हिंदी साहित्य के विद्वान जैसे रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी अपभ्रंश के महत्व और उसकी विशेषताओं पर प्रकाश डाला है। उदाहरण के लिए, "कम्म" (कर्म) और "धम्म" (धर्म) जैसे शब्दों का प्रयोग अपभ्रंश साहित्य में व्यापक रूप से मिलता है।
1. स्वरः
● हस्व स्वर: अ, इ, उ, ए, ओ।
● दीर्घ स्वर: आ, ई, ऊ, ए, ओ (ऐ व औ का पाली में लोप)।
उदाहरण के लिए, "कण्ह" (कृष्ण) और "मितु" (मृत्यु) में स्वर परिवर्तन देखा जा सकता है।
2. 'ऋ' का प्रयोग नहीं मिलता है; 'रि' का प्रयोग चलता रहा।
○ उदाहरण: कृष्ण – कण्ह, मृत्यु - मितु, ऋण - रिण।
3. उकार बहुलताः
○ भाषा में उकार की बहुलता मिलती है; जैसे: मन - मनु, चल - चलु, अंग - अंगु।
4. अनुनासिकताः
○ i. कहीं-कहीं स्वरों के अनुनासिक रूप विकसित हुए हैं। जैसे: चलहि – चलहिं, पक्षी – पखि।
○ ii. कुछ अनुनासिक शब्द अनुनासिकता रहित हैं। जैसे: सिंह - सीह, विंशति – वीस।
○ iii. अकारण अनुनासिक शब्द। जैसे: अक्षु – अंसु, वक्र - वंक।
5. स्वर भक्तिः
○ उदाहरण: प्रदेश – परदेश, क्रिया – किरिया।
6. स्वर लोपः
○ उदाहरण: अरण्य – रण (आदि स्वर लोप), लज्जा – लाज (अन्त्य स्वर लोप)।
7. व्यंजनमालाः
○ व्यंजनमाला में ङ, ञ, न, श, ष का अभाव; 'ट' वर्ग की प्रधानता।
8. अंत्य व्यंजन लुप्त भाषाः
○ उदाहरण: जगत – जग, महान – महा।
9. संयुक्त व्यंजन समाप्तः
○ य, र, ल, व समाप्त। जैसे: चक्र – चक्क, धर्म – धम्म, कर्म – कम्म।
10. तत्सम, तद्भव, देशज-विदेशज सभी प्रकार के शब्द मिलते हैं; तद्भव की संख्या सर्वाधिक है।
○ तुर्कों के आगमन से विदेशी शब्दों के प्रयोग होने लगे।
11. दो ही वचनः
○ अपभ्रंश में दो ही वचन होते हैं – एकवचन और बहुवचन। द्विवचन के सारे शब्द बहुवचन में शामिल हो गए।
इन विशेषताओं के माध्यम से अपभ्रंश भाषा की व्याकरणिक संरचना को समझा जा सकता है। हिंदी साहित्य के विद्वान जैसे रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी अपभ्रंश के महत्व और उसकी विशेषताओं पर प्रकाश डाला है। उदाहरण के लिए, "कम्म" (कर्म) और "धम्म" (धर्म) जैसे शब्दों का प्रयोग अपभ्रंश साहित्य में व्यापक रूप से मिलता है।
Conclusion
अपभ्रंश भाषा, प्राकृत का विकसित रूप, 500 से 1200 ईस्वी के बीच उत्तरी भारत में प्रचलित थी। इसकी व्याकरणिक विशेषताओं में स्वर और व्यंजन परिवर्तन, अनुनासिकता, स्वर लोप, और संयुक्त व्यंजन का लोप शामिल है। तद्भव शब्दों की प्रधानता और विदेशी शब्दों का समावेश भी देखा जाता है। यह भाषा समकालीन सामाजिक, राजनीतिक, और धार्मिक अनुभवों को व्यक्त करती है, जो इसे एक विशिष्ट भाषायी पहचान प्रदान करती है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसे भारतीय भाषाओं के विकास में महत्वपूर्ण माना है।