हिन्दी के विकास में अपभ्रंश के योगदान का आकलन कीजिए।
(UPSC 2015, 20 Marks, )
हिन्दी के विकास में अपभ्रंश के योगदान का आकलन कीजिए।
हिन्दी के विकास में अपभ्रंश के योगदान का आकलन कीजिए।
(UPSC 2015, 20 Marks, )
Introduction
अपभ्रंश का हिन्दी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। प्रारंभिक हिन्दी की ध्वनियाँ, शब्द, और अर्थविषयक समानताएँ अपभ्रंश से प्राप्त हुईं। परवर्ती अपभ्रंश में सांस्कृतिक पुनरुत्थान के कारण तत्समता की प्रवृत्ति बढ़ी, जो हिन्दी में भी परिलक्षित होती है। विभक्ति लोप और परसर्गों का उदय अपभ्रंश से हिन्दी में आया। हिन्दी की तद्भव धातुएँ और कृदन्त तद्भव अपभ्रंश की प्रवृत्तियों का अनुसरण करते हैं।
Explanation
हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। अपभ्रंश से हिन्दी भाषा की ध्वनि, शब्द और अर्थविषयक समानता का विकास हुआ। प्रारंभिक हिन्दी की ध्वनियाँ अपभ्रंश और अवहट्ट से प्राप्त हुई हैं।
(i) समानता के बिन्दु:
(क) ध्वनि, शब्द एवं अर्थविषयक समानता: हिन्दी की ध्वनियाँ अपभ्रंश से ही प्राप्त हुई हैं। जैसे, "सहुँ" से "से", "कहुँ" से "को", "केरि" से "के" आदि।
(ख) तत्समता की प्रवृत्ति: परवर्ती अपभ्रंश में सांस्कृतिक पुनरूत्थान के कारण तत्समता की प्रवृत्ति बढ़ गई। जैसे, वैष्णव काव्य में तत्सम शब्दों का प्रयोग।
(ग) तद्भव और देशज शब्द: हिन्दी के तद्भव और देशज शब्द अपभ्रंश/अवहट्ट के रास्ते ही प्राप्त हुए। जैसे, "चुम्ब" से "चूम", "खाद" से "खा", "तुट" से "टूट" आदि।
(ii) विश्लिष्टता:
(क) परसर्गों का उदय: विभक्ति के लोप से कारकत्व के बोध की समस्या के निवारण के लिए अपभ्रंश में परसर्गों का उदय हुआ।
(ख) विशेषण और क्रियाविशेषण: अपभ्रंश के विशेषण और क्रियाविशेषण हिन्दी में थोड़े हेर-फेर के साथ आ गए। जैसे, "अज्जु" से "आज", "एवहिं" से "अबहिं"।
(ग) सहायक क्रियाएँ: अपभ्रंश की सहायक क्रियाएँ हिन्दी में थोड़े रूपांतर के साथ आ गईं।
(घ) तद्भव धातुएँ: हिन्दी की सभी तद्भव धातुएँ अपभ्रंश से ही आयी हैं। जैसे, "चक्ख" से "चख", "घड्ड" से "छोड़"।
हिन्दी में कृदन्त तद्भवों का प्राबल्य अपभ्रंश की प्रवृत्ति का ही अनुवर्तन है।
हिन्दी साहित्य के विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी हिन्दी के विकास में अपभ्रंश के योगदान को महत्वपूर्ण माना है। उनके अनुसार, "अपभ्रंश ने हिन्दी को ध्वनि और शब्दों की समृद्धि प्रदान की।"
इस प्रकार, अपभ्रंश ने हिन्दी भाषा के विकास में ध्वनि, शब्द, अर्थ और व्याकरणिक संरचना के स्तर पर महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
(i) समानता के बिन्दु:
(क) ध्वनि, शब्द एवं अर्थविषयक समानता: हिन्दी की ध्वनियाँ अपभ्रंश से ही प्राप्त हुई हैं। जैसे, "सहुँ" से "से", "कहुँ" से "को", "केरि" से "के" आदि।
(ख) तत्समता की प्रवृत्ति: परवर्ती अपभ्रंश में सांस्कृतिक पुनरूत्थान के कारण तत्समता की प्रवृत्ति बढ़ गई। जैसे, वैष्णव काव्य में तत्सम शब्दों का प्रयोग।
(ग) तद्भव और देशज शब्द: हिन्दी के तद्भव और देशज शब्द अपभ्रंश/अवहट्ट के रास्ते ही प्राप्त हुए। जैसे, "चुम्ब" से "चूम", "खाद" से "खा", "तुट" से "टूट" आदि।
(ii) विश्लिष्टता:
(क) परसर्गों का उदय: विभक्ति के लोप से कारकत्व के बोध की समस्या के निवारण के लिए अपभ्रंश में परसर्गों का उदय हुआ।
(ख) विशेषण और क्रियाविशेषण: अपभ्रंश के विशेषण और क्रियाविशेषण हिन्दी में थोड़े हेर-फेर के साथ आ गए। जैसे, "अज्जु" से "आज", "एवहिं" से "अबहिं"।
(ग) सहायक क्रियाएँ: अपभ्रंश की सहायक क्रियाएँ हिन्दी में थोड़े रूपांतर के साथ आ गईं।
(घ) तद्भव धातुएँ: हिन्दी की सभी तद्भव धातुएँ अपभ्रंश से ही आयी हैं। जैसे, "चक्ख" से "चख", "घड्ड" से "छोड़"।
हिन्दी में कृदन्त तद्भवों का प्राबल्य अपभ्रंश की प्रवृत्ति का ही अनुवर्तन है।
हिन्दी साहित्य के विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी हिन्दी के विकास में अपभ्रंश के योगदान को महत्वपूर्ण माना है। उनके अनुसार, "अपभ्रंश ने हिन्दी को ध्वनि और शब्दों की समृद्धि प्रदान की।"
इस प्रकार, अपभ्रंश ने हिन्दी भाषा के विकास में ध्वनि, शब्द, अर्थ और व्याकरणिक संरचना के स्तर पर महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
Conclusion
अपभ्रंश ने हिन्दी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। प्रारंभिक हिन्दी की ध्वनियाँ, शब्द, और अर्थविषयक समानताएँ अपभ्रंश से प्राप्त हुईं। तत्समता और विश्लिष्टता की प्रवृत्तियाँ भी अपभ्रंश से ली गईं। विभक्तियों के लोप से उत्पन्न समस्याओं के समाधान हेतु परसर्गों का उदय हुआ। हिन्दी की तद्भव धातुएँ और देशज शब्द अपभ्रंश से आए। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी अपभ्रंश के योगदान को रेखांकित किया है। भविष्य में, हिन्दी के विकास में अपभ्रंश की भूमिका को और गहराई से समझने की आवश्यकता है।