राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में महात्मा गाँधी और राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
(UPSC 2016, 15 Marks, )
Theme:
महात्मा गांधी और टंडन: राष्ट्रभाषा के प्रचारक
Where in Syllabus:
(Modern Indian History)
राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में महात्मा गाँधी और राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में महात्मा गाँधी और राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
(UPSC 2016, 15 Marks, )
Theme:
महात्मा गांधी और टंडन: राष्ट्रभाषा के प्रचारक
Where in Syllabus:
(Modern Indian History)
राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में महात्मा गाँधी और राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
Introduction
महात्मा गाँधी और राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गाँधीजी ने हिंदी को जनमानस की भाषा मानते हुए इसे राष्ट्रीय एकता का माध्यम बताया। टंडन ने हिंदी को संविधान सभा में राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने में योगदान दिया। दोनों ने हिंदी के विकास और प्रसार के लिए अनेक आंदोलनों और सम्मेलनों का आयोजन किया, जिससे हिंदी को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
महात्मा गांधी और टंडन: राष्ट्रभाषा के प्रचारक
● महात्मा गांधी की भूमिका:
● स्वराज्य और भाषा: गांधी जी ने हिन्दी को स्वराज्य का प्रश्न माना। उन्होंने इसे राष्ट्रीय आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति का माध्यम बताया और अंग्रेजी के प्रभुत्व को समाप्त करने की वकालत की।
● कांग्रेस में हिन्दी का प्रयोग: गांधी जी के प्रयासों से कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन (1925) में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस की कार्यवाही हिन्दी में चलाई जाए।
● राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएं: गांधी जी ने वर्धा और मद्रास में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएं स्थापित कीं और हिन्दी को सिद्धांत और व्यवहार दोनों स्तरों पर अपनाया।
● शिक्षा और साहित्य: गांधी जी की प्रेरणा से विद्यापीठों और हिन्दी साहित्य सम्मेलनों में हिन्दी में परीक्षाएं आयोजित की गईं।
● राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की भूमिका:
● हिन्दी का प्रहरी: टंडन जी को हिन्दी का प्रहरी कहा गया। उनके प्रयासों से हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई, जिसमें लाखों विद्यार्थी परीक्षाएं दे चुके हैं।
● राजभाषा का दर्जा: टंडन जी ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
● देवनागरी लिपि का समर्थन: उन्होंने देवनागरी लिपि के उपयोग पर जोर दिया और अरबी-फारसी मूल वाले उर्दू लिपि को अस्वीकार किया।
● विधान मंडलों में हिन्दी: टंडन जी ने विधान मंडलों और संसद में हिन्दी में बहस करने की मुहिम चलाई और देवनागरी अंकों के प्रयोग की वकालत की।
● स्वराज्य और भाषा: गांधी जी ने हिन्दी को स्वराज्य का प्रश्न माना। उन्होंने इसे राष्ट्रीय आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति का माध्यम बताया और अंग्रेजी के प्रभुत्व को समाप्त करने की वकालत की।
● कांग्रेस में हिन्दी का प्रयोग: गांधी जी के प्रयासों से कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन (1925) में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस की कार्यवाही हिन्दी में चलाई जाए।
● राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएं: गांधी जी ने वर्धा और मद्रास में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएं स्थापित कीं और हिन्दी को सिद्धांत और व्यवहार दोनों स्तरों पर अपनाया।
● शिक्षा और साहित्य: गांधी जी की प्रेरणा से विद्यापीठों और हिन्दी साहित्य सम्मेलनों में हिन्दी में परीक्षाएं आयोजित की गईं।
● राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की भूमिका:
● हिन्दी का प्रहरी: टंडन जी को हिन्दी का प्रहरी कहा गया। उनके प्रयासों से हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई, जिसमें लाखों विद्यार्थी परीक्षाएं दे चुके हैं।
● राजभाषा का दर्जा: टंडन जी ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
● देवनागरी लिपि का समर्थन: उन्होंने देवनागरी लिपि के उपयोग पर जोर दिया और अरबी-फारसी मूल वाले उर्दू लिपि को अस्वीकार किया।
● विधान मंडलों में हिन्दी: टंडन जी ने विधान मंडलों और संसद में हिन्दी में बहस करने की मुहिम चलाई और देवनागरी अंकों के प्रयोग की वकालत की।
Conclusion
महात्मा गाँधी और राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गाँधीजी ने हिंदी को जनमानस की भाषा बनाने पर जोर दिया, जबकि टंडन ने इसे संवैधानिक मान्यता दिलाने में योगदान दिया। गाँधीजी का मानना था, "राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।" टंडन ने हिंदी को राष्ट्रीय एकता का माध्यम माना। आगे बढ़ने के लिए, हमें भाषाई समावेशिता और शिक्षा में हिंदी के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए।