स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अहिन्दी भाषी व्यक्तित्वों के योगदान की चर्चा कीजिए। (UPSC 2020, 20 Marks, )

Theme: अहिन्दी भाषियों का हिन्दी प्रचार में योगदान Where in Syllabus: (Modern Indian History)
स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अहिन्दी भाषी व्यक्तित्वों के योगदान की चर्चा कीजिए।

Introduction

स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अहिन्दी भाषी व्यक्तित्वों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। महात्मा गांधी ने हिन्दी को जनमानस की भाषा बनाने का आह्वान किया। सी. राजगोपालाचारी और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं ने हिन्दी को राष्ट्रीय एकता का माध्यम माना। रवींद्रनाथ टैगोर ने हिन्दी को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बताया। इन नेताओं के प्रयासों से हिन्दी ने राष्ट्रीय आंदोलन में एकता और संचार का सशक्त माध्यम बनकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अहिन्दी भाषियों का हिन्दी प्रचार में योगदान

 ● महात्मा गांधी: गांधीजी ने हिंदी को स्वतंत्रता संग्राम की भाषा बनाने के लिए अथक प्रयास किया। उन्होंने 1917 में हिंदी सीखने के कार्य का सूत्रपात किया और 1925 में कांग्रेस ने हिंदी को कामकाज की भाषा बनाने का प्रस्ताव पास किया। गांधीजी ने विभिन्न राज्यों में हिंदी प्रचार के लिए नेताओं को प्रेरित किया और अपने बेटे देवदास गांधी को दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार के लिए भेजा।  
  ● केशवचंद्र सेन: बंगाल के केशवचंद्र सेन ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का विचार प्रस्तुत किया। उन्होंने 1873 में अपने पत्र 'सुलभ समाचार' में लिखा कि भारतवर्ष में एकता के लिए एक भाषा का प्रयोग आवश्यक है।  
  ● बाल गंगाधर तिलक: तिलक ने हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हुए देवनागरी को हिंदी की लिपि माना। उन्होंने 'हिन्दी केसरी' नामक पत्रिका का प्रकाशन किया और हिंदी में भाषण देने की परंपरा शुरू की।  
  ● चक्रवर्ती राजगोपालाचारी: गांधीजी के प्रयासों से तमिलनाडु में हिंदी के प्रति उत्साह बढ़ा। राजगोपालाचारी जैसे नेता हिंदी के प्रचार को अपना समर्थन दे रहे थे।  
  ● लाला लाजपत राय: पंजाब में हिंदी के प्रचार का श्रेय लाला लाजपत राय को जाता है। उन्होंने उर्दू-हिंदी विवाद के समय हिंदी का समर्थन किया और पंजाब के शिक्षा क्षेत्र में हिंदी को स्थान दिलाया।  
 इन अहिन्दी भाषी व्यक्तित्वों ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे हिंदी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक संपर्क भाषा के रूप में उभरी।

Conclusion

स्वाधीनता आंदोलन में अहिन्दी भाषी व्यक्तित्वों का योगदान महत्वपूर्ण था। महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस ने हिन्दी को राष्ट्रीय एकता का माध्यम माना। सी. राजगोपालाचारी और वी.वी. गिरी जैसे नेताओं ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में योगदान दिया। गांधीजी ने कहा, "हिन्दी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।" आगे बढ़ते हुए, हिन्दी को सभी भारतीय भाषाओं के साथ समन्वय में विकसित करना आवश्यक है, जिससे राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समृद्धि को बढ़ावा मिले।