राष्ट्रभाषा की अवधारणा और हिन्दी।
(UPSC 2024, 10 Marks, )
Theme:
राष्ट्रभाषा की अवधारणा और हिन्दी का महत्व
Where in Syllabus:
(Indian Languages and Linguistics)
राष्ट्रभाषा की अवधारणा और हिन्दी।
राष्ट्रभाषा की अवधारणा और हिन्दी।
(UPSC 2024, 10 Marks, )
Theme:
राष्ट्रभाषा की अवधारणा और हिन्दी का महत्व
Where in Syllabus:
(Indian Languages and Linguistics)
राष्ट्रभाषा की अवधारणा और हिन्दी।
Introduction
राष्ट्रभाषा की अवधारणा भारत में महात्मा गांधी और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे विचारकों द्वारा समर्थित थी, जिन्होंने इसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक माना। हिन्दी, जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है, को 14 सितंबर 1949 को भारत की राजभाषा घोषित किया गया। यह भाषा भारत के विभिन्न हिस्सों में संवाद का माध्यम बनकर सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को जोड़ने का कार्य करती है।
राष्ट्रभाषा की अवधारणा और हिन्दी का महत्व
● राष्ट्रभाषा की आवश्यकता:
○ एक राष्ट्रभाषा का होना राष्ट्रीय सम्मान और भावनात्मक एकता के लिए आवश्यक है।
○ यह एक समुन्नत भाषा की उपस्थिति का सूचक है, जो देश के लोगों को एक सूत्र में बांधती है।
● भावनात्मक एकता और भाषा:
● भावनात्मक एकता का सबसे महत्वपूर्ण साधन भाषाओं की एकता है।
○ भावों की एकता का अहसास भाषा के माध्यम से ही संभव है।
● स्वदेशी भाषा का महत्व:
● स्वदेशी भाषा ही राष्ट्रभाषा का कार्य कर सकती है।
○ स्वाधीनता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने का आह्वान किया।
● हिन्दी का ऐतिहासिक संदर्भ:
● 1925 में कानपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दी के प्रयोग का समर्थन किया।
○ स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व, पूरा भारत हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानता था।
● संविधान और हिन्दी:
○ संविधान ने हिन्दी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया है, राष्ट्रभाषा के रूप में नहीं।
○ संविधान में हिन्दी के विकास के संदर्भ में सामासिक संस्कृति का उल्लेख हिन्दी के राष्ट्रभाषा रूप की स्वीकृति है।
● हिन्दी की अनिवार्यता:
○ राष्ट्रभाषा संपूर्ण देश में भावनात्मक एवं सांस्कृतिक एकता स्थापित करने का प्रधान साधन होती है।
○ भारत की अखंडता, एकता और राष्ट्रनिर्माण के लिए हिन्दी का संपर्क भाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में होना अनिवार्य है।
○ एक राष्ट्रभाषा का होना राष्ट्रीय सम्मान और भावनात्मक एकता के लिए आवश्यक है।
○ यह एक समुन्नत भाषा की उपस्थिति का सूचक है, जो देश के लोगों को एक सूत्र में बांधती है।
● भावनात्मक एकता और भाषा:
● भावनात्मक एकता का सबसे महत्वपूर्ण साधन भाषाओं की एकता है।
○ भावों की एकता का अहसास भाषा के माध्यम से ही संभव है।
● स्वदेशी भाषा का महत्व:
● स्वदेशी भाषा ही राष्ट्रभाषा का कार्य कर सकती है।
○ स्वाधीनता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने का आह्वान किया।
● हिन्दी का ऐतिहासिक संदर्भ:
● 1925 में कानपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दी के प्रयोग का समर्थन किया।
○ स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व, पूरा भारत हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानता था।
● संविधान और हिन्दी:
○ संविधान ने हिन्दी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया है, राष्ट्रभाषा के रूप में नहीं।
○ संविधान में हिन्दी के विकास के संदर्भ में सामासिक संस्कृति का उल्लेख हिन्दी के राष्ट्रभाषा रूप की स्वीकृति है।
● हिन्दी की अनिवार्यता:
○ राष्ट्रभाषा संपूर्ण देश में भावनात्मक एवं सांस्कृतिक एकता स्थापित करने का प्रधान साधन होती है।
○ भारत की अखंडता, एकता और राष्ट्रनिर्माण के लिए हिन्दी का संपर्क भाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में होना अनिवार्य है।
Conclusion
राष्ट्रभाषा की अवधारणा में हिन्दी का महत्वपूर्ण स्थान है, जो भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को जोड़ती है। महात्मा गांधी ने हिन्दी को जनमानस की भाषा कहा, जो राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, 43.63% भारतीय हिन्दी बोलते हैं। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने से क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान बना रहना चाहिए। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा, "हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाना हमारी सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।"