उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ीबोली के विकास पर प्रकाश डालिए।
(UPSC 2021, 15 Marks, )
Theme:
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ीबोली का विकास
Where in Syllabus:
(Modern Indian History)
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ीबोली के विकास पर प्रकाश डालिए।
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ीबोली के विकास पर प्रकाश डालिए।
(UPSC 2021, 15 Marks, )
Theme:
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ीबोली का विकास
Where in Syllabus:
(Modern Indian History)
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ीबोली के विकास पर प्रकाश डालिए।
Introduction
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ीबोली का विकास महत्वपूर्ण था, जिसमें इसे साहित्यिक भाषा के रूप में मान्यता मिली। भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्यकारों ने इसे प्रोत्साहित किया। इस काल में खड़ीबोली ने ब्रजभाषा और अवधी को पीछे छोड़ते हुए हिंदी साहित्य में प्रमुख स्थान प्राप्त किया। फोर्ट विलियम कॉलेज और हिंदी नवजागरण ने भी इसके विकास में योगदान दिया, जिससे यह आधुनिक हिंदी की नींव बनी।
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ीबोली का विकास
● ब्रजभाषा का पतन: उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रजभाषा का पतन हुआ और खड़ीबोली ने उसका स्थान लिया। यह परिवर्तन साहित्यिक और सामाजिक परिवर्तनों का परिणाम था।
● आधुनिकता का आगमन: इस समय आधुनिकता के आगमन के कारण यथार्थ और सामाजिक जीवन के सभी पक्षों का वर्णन खड़ीबोली में आसान हो गया।
● सामाजिक सुधार आंदोलन: राजा राम मोहन राय और दयानंद सरस्वती जैसे समाज सुधारकों ने खड़ीबोली के विकास में योगदान दिया।
● प्रेस का विकास: उन्नीसवीं शताब्दी में प्रेस का विकास हुआ, जिससे खड़ीबोली को बढ़ावा मिला।
● अंग्रेजों का आगमन: अंग्रेजों के आगमन के बाद ईसाई मिशनरियों और स्थापित कॉलेजों ने खड़ीबोली को अपनाया, जिससे इसका प्रसार हुआ।
● फोर्ट विलियम कॉलेज का योगदान: फोर्ट विलियम कॉलेज के लल्लू लालजी और सदल मिश्र ने खड़ीबोली के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। जौन गिलक्रिस्ट ने व्याकरण और शब्दकोश का निर्माण किया।
● भारतेन्दु युग (1850-1900 ई.): भारतेन्दु हरिश्चंद्र का आगमन खड़ीबोली के विकास में मील का पत्थर साबित हुआ। उन्होंने साहित्यिक वातावरण का निर्माण किया और भारतेन्दु मंडल की स्थापना की।
● प्रमुख रचनाएं: भारतेन्दु ने कर्पूरमंजरी (1875), भारत जननी (1874), मुद्राराक्षस (1875), सत्य हरिश्चन्द्र (1875), भारत दुर्दशा (1880), और अंधेर नगरी (1881) जैसी रचनाएं कीं।
● गद्य का विकास: इस काल में खड़ीबोली ने गद्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान स्थापित किया। बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र जैसे लेखकों ने इसमें योगदान दिया।
● पद्य में कठिनाई: भारतेन्दु ने स्वीकार किया कि खड़ीबोली में पद्य रचना कठिन थी, लेकिन आगे चलकर द्विवेदी युग में खड़ीबोली ने गद्य और पद्य दोनों की भाषा के रूप में विकास किया।
● आधुनिकता का आगमन: इस समय आधुनिकता के आगमन के कारण यथार्थ और सामाजिक जीवन के सभी पक्षों का वर्णन खड़ीबोली में आसान हो गया।
● सामाजिक सुधार आंदोलन: राजा राम मोहन राय और दयानंद सरस्वती जैसे समाज सुधारकों ने खड़ीबोली के विकास में योगदान दिया।
● प्रेस का विकास: उन्नीसवीं शताब्दी में प्रेस का विकास हुआ, जिससे खड़ीबोली को बढ़ावा मिला।
● अंग्रेजों का आगमन: अंग्रेजों के आगमन के बाद ईसाई मिशनरियों और स्थापित कॉलेजों ने खड़ीबोली को अपनाया, जिससे इसका प्रसार हुआ।
● फोर्ट विलियम कॉलेज का योगदान: फोर्ट विलियम कॉलेज के लल्लू लालजी और सदल मिश्र ने खड़ीबोली के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। जौन गिलक्रिस्ट ने व्याकरण और शब्दकोश का निर्माण किया।
● भारतेन्दु युग (1850-1900 ई.): भारतेन्दु हरिश्चंद्र का आगमन खड़ीबोली के विकास में मील का पत्थर साबित हुआ। उन्होंने साहित्यिक वातावरण का निर्माण किया और भारतेन्दु मंडल की स्थापना की।
● प्रमुख रचनाएं: भारतेन्दु ने कर्पूरमंजरी (1875), भारत जननी (1874), मुद्राराक्षस (1875), सत्य हरिश्चन्द्र (1875), भारत दुर्दशा (1880), और अंधेर नगरी (1881) जैसी रचनाएं कीं।
● गद्य का विकास: इस काल में खड़ीबोली ने गद्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान स्थापित किया। बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र जैसे लेखकों ने इसमें योगदान दिया।
● पद्य में कठिनाई: भारतेन्दु ने स्वीकार किया कि खड़ीबोली में पद्य रचना कठिन थी, लेकिन आगे चलकर द्विवेदी युग में खड़ीबोली ने गद्य और पद्य दोनों की भाषा के रूप में विकास किया।
Conclusion
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ीबोली का विकास महत्वपूर्ण था, जिसमें भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्यकारों ने योगदान दिया। इस काल में खड़ीबोली ने साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की। गांधीजी ने इसे राष्ट्रीय एकता का माध्यम माना। राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिंद' ने इसे शिक्षा में प्रोत्साहित किया। आगे चलकर, खड़ीबोली ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया और आधुनिक हिंदी के विकास की नींव रखी। "भाषा ही संस्कृति की आत्मा है" इस विचार को आगे बढ़ाना आवश्यक है।