उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की स्थिति।
(UPSC 2017, 10 Marks, )
Theme:
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली का विकास
Where in Syllabus:
(The subject of the above question is "Hindi Literature.")
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की स्थिति।
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की स्थिति।
(UPSC 2017, 10 Marks, )
Theme:
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली का विकास
Where in Syllabus:
(The subject of the above question is "Hindi Literature.")
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की स्थिति।
Introduction
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली का विकास महत्वपूर्ण था, विशेषकर भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी के योगदान से। इस काल में खड़ी बोली ने साहित्यिक भाषा के रूप में अपनी पहचान बनाई। भारतेंदु युग में इसे आधुनिक हिंदी साहित्य की नींव माना गया। द्विवेदी युग में खड़ी बोली ने गद्य और पद्य दोनों में अपनी स्थिति मजबूत की, जिससे यह हिंदी साहित्य की प्रमुख भाषा बन गई।
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली का विकास
● खड़ी बोली का विकास:
○ उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली का विकास अत्यंत तीव्र गति से हुआ।
○ यह विकास आधुनिकता के आगमन, गद्य के विकास, और फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना के कारण संभव हुआ।
● ईसाई मिशनरियों और सामाजिक सुधार आंदोलनों ने भी खड़ी बोली को केंद्र में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
● ब्रजभाषा की सीमाएँ:
● ब्रजभाषा मध्यकालीन मानसिकता से युक्त थी और आधुनिकता एवं नवजागरण चेतना को धारण करने में असमर्थ थी।
○ इस कारण, खड़ी बोली 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में साहित्य और समाज के स्तर पर स्थापित हो गई।
● फोर्ट विलियम कॉलेज का योगदान:
● जॉन गिलक्रिस्ट ने भारतीय भाषाओं का व्यापक अध्ययन किया और एक व्याकरण व शब्दकोष का निर्माण किया।
○ गिलक्रिस्ट की भाषा नीति में उर्दू के प्रयोगों की बहुलता थी।
○ उनके चार सहायक - इंशा अल्ला खां, लल्लू लाल, सदल मिश्र, और सदासुखलाल ने खड़ी बोली के विकास में प्रमुख भूमिका निभाई।
● खड़ी बोली की शैलियाँ:
○ 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में खड़ी बोली की दो शैलियों का विकास हुआ:
● राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द (फारसी निष्ठ)
● लक्ष्मण सिंह (संस्कृत निष्ठ)
● भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का योगदान:
○ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का साहित्य के क्षेत्र में आगमन खड़ी बोली के विकास की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी।
○ उन्होंने न केवल स्वयं अनेक रचनाओं का प्रणयन किया बल्कि एक व्यापक साहित्यिक वातावरण भी पैदा किया।
○ उनके सहयोगी लेखकों का समूह भारतेन्दु मंडल के नाम से जाना गया, जिसमें बलकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, और चौधरी बदरीनारायण प्रेमधन जैसे विद्वान शामिल थे।
● खड़ी बोली का बहुआयामी विकास:
○ 19वीं शताब्दी में खड़ी बोली ने विकास के बहुआयामी चरण पार किए, जिससे यह साहित्य और समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकी।
○ उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली का विकास अत्यंत तीव्र गति से हुआ।
○ यह विकास आधुनिकता के आगमन, गद्य के विकास, और फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना के कारण संभव हुआ।
● ईसाई मिशनरियों और सामाजिक सुधार आंदोलनों ने भी खड़ी बोली को केंद्र में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
● ब्रजभाषा की सीमाएँ:
● ब्रजभाषा मध्यकालीन मानसिकता से युक्त थी और आधुनिकता एवं नवजागरण चेतना को धारण करने में असमर्थ थी।
○ इस कारण, खड़ी बोली 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में साहित्य और समाज के स्तर पर स्थापित हो गई।
● फोर्ट विलियम कॉलेज का योगदान:
● जॉन गिलक्रिस्ट ने भारतीय भाषाओं का व्यापक अध्ययन किया और एक व्याकरण व शब्दकोष का निर्माण किया।
○ गिलक्रिस्ट की भाषा नीति में उर्दू के प्रयोगों की बहुलता थी।
○ उनके चार सहायक - इंशा अल्ला खां, लल्लू लाल, सदल मिश्र, और सदासुखलाल ने खड़ी बोली के विकास में प्रमुख भूमिका निभाई।
● खड़ी बोली की शैलियाँ:
○ 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में खड़ी बोली की दो शैलियों का विकास हुआ:
● राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द (फारसी निष्ठ)
● लक्ष्मण सिंह (संस्कृत निष्ठ)
● भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का योगदान:
○ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का साहित्य के क्षेत्र में आगमन खड़ी बोली के विकास की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी।
○ उन्होंने न केवल स्वयं अनेक रचनाओं का प्रणयन किया बल्कि एक व्यापक साहित्यिक वातावरण भी पैदा किया।
○ उनके सहयोगी लेखकों का समूह भारतेन्दु मंडल के नाम से जाना गया, जिसमें बलकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, और चौधरी बदरीनारायण प्रेमधन जैसे विद्वान शामिल थे।
● खड़ी बोली का बहुआयामी विकास:
○ 19वीं शताब्दी में खड़ी बोली ने विकास के बहुआयामी चरण पार किए, जिससे यह साहित्य और समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकी।
Conclusion
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली का विकास महत्वपूर्ण था, जो हिंदी साहित्य के उत्थान का आधार बना। इस काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्यकारों ने खड़ी बोली को साहित्यिक मान्यता दिलाई। भारतेंदु युग में खड़ी बोली ने हिंदी गद्य और पद्य में अपनी पहचान बनाई। आगे चलकर, खड़ी बोली ने हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महात्मा गांधी ने भी इसे जनमानस की भाषा के रूप में समर्थन दिया।