उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा के प्रमुख कारण क्या थे? स्पष्ट कीजिए। (UPSC 2020, 20 Marks, )

Theme: उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली का उदय Where in Syllabus: (Modern Indian History)
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा के प्रमुख कारण क्या थे? स्पष्ट कीजिए।

Introduction

उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा के प्रमुख कारणों में इसका सरल और स्पष्ट व्याकरण, तथा भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्यकारों का योगदान शामिल है। भारतेंदु ने इसे साहित्यिक भाषा के रूप में अपनाया, जबकि द्विवेदी ने इसे गद्य लेखन में प्रोत्साहित किया। इसके अलावा, प्रिंटिंग प्रेस के आगमन और शिक्षा के प्रसार ने भी खड़ी बोली को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली का उदय

 ● भौगोलिक विस्तार: खड़ी बोली का प्रयोग उत्तर भारत के एक बड़े भूभाग में होता था, जिसमें जैसलमेर, अम्बाला, शिमला, भागलपुर, रायपुर, और खंडवा जैसे क्षेत्र शामिल थे। इस व्यापक क्षेत्रीय उपयोग ने इसे एक प्रमुख भाषा के रूप में स्थापित किया।  
  ● शिक्षा और साहित्य: खड़ी बोली को स्कूलों और विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम बनाया गया, जिससे इसकी प्रतिष्ठा बढ़ी। इसके अलावा, पत्र-पत्रिकाओं और साहित्य में भी इसका व्यापक उपयोग हुआ।  
  ● साहित्यकारों का योगदान:  
    ● फोर्ट विलियम कॉलेज के रचनाकारों जैसे सदासुख लाल 'नियाज' और इंशा अल्ला खाँ ने खड़ी बोली गद्य के विकास में योगदान दिया।  
    ● भारतेन्दु हरिश्चंद्र के नेतृत्व में खड़ी बोली को गद्य साहित्य के लिए अपनाया गया। उन्होंने भारतेन्दु मंडल के माध्यम से लेखकों का एक समूह तैयार किया।  
    ● आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' पत्रिका के माध्यम से खड़ी बोली के परिष्कार का कार्य किया।  
  ● भाषाई संघर्ष और समाधान:  
    ● राजा शिव प्रसाद 'सितारे हिन्द' और राजा लक्ष्मण सिंह ने हिंदी के स्वरूप निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  
    ● भारतेन्दु युग में हिंदी गद्य की प्रतिष्ठा स्थापित हुई और खड़ी बोली को गद्य रचना के लिए माध्यम के रूप में अपनाया गया।  
  ● छायावाद युग का योगदान:  
    ● प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी वर्मा जैसे साहित्यकारों ने खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में समृद्ध किया।  
        ○ इस युग में खड़ी बोली ने सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति में ब्रजभाषा को पीछे छोड़ दिया।
  ● भाषाई विकास:  
        ○ खड़ी बोली ने ब्रजभाषा को पीछे छोड़ते हुए हिंदी साहित्य का प्रमुख माध्यम बन गई।
    ● द्विवेदी युग में साहित्य रचना की विविध विधाएँ विकसित हुईं, जिससे खड़ी बोली की प्रतिष्ठा और बढ़ी।  
 इन सभी कारणों ने उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Conclusion

उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा के प्रमुख कारणों में इसका सरल और स्पष्ट व्याकरण, जनसाधारण में प्रचलित होना, और साहित्यकारों जैसे भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान शामिल है। फोर्ट विलियम कॉलेज ने भी इसे बढ़ावा दिया। राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिंद' ने इसे शिक्षा और प्रशासन की भाषा बनाने में मदद की। आगे बढ़ते हुए, खड़ी बोली ने हिंदी साहित्य को एक नई दिशा दी, जिससे यह राष्ट्रीय एकता का माध्यम बनी।