मध्यकाल में साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज का विकास। (UPSC 2015, 10 Marks, )

Theme: मध्यकालीन साहित्य में ब्रज भाषा का विकास Where in Syllabus: (Medieval Indian Literature)
मध्यकाल में साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज का विकास।

Introduction

मध्यकाल में ब्रज भाषा का साहित्यिक विकास महत्वपूर्ण था, विशेषकर भक्ति आंदोलन के दौरान। सूरदास, कबीर, और मीरा बाई जैसे कवियों ने इसे अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया। भक्तिकाल में ब्रज भाषा ने धार्मिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनकर उभरने में मदद की। इस काल में ब्रज भाषा ने साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध किया, जिससे यह क्षेत्रीय भाषा से परे एक व्यापक साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित हुई।

मध्यकालीन साहित्य में ब्रज भाषा का विकास

 ● ब्रजभाषा का विकास:  
    ● प्रथम चरण (प्रारंभ से 1525 ई. तक):  
      ● शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित।  
      ● हेमचंद्र के व्याकरण में ब्रजभाषा के प्रारंभिक अभिलक्षण।  
          ○ उदाहरण: सासानाल, जाल, झलक्कियउ
      ● सुधीर अग्रवाल की प्रद्युम्न चरित (1354 ई.) में ब्रजभाषा के प्रमुख अभिलक्षण।  
    ● द्वितीय चरण (1525 से 1800 ई. तक):  
      ● गौड़ीय वैष्णव और पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय के प्रभाव से कृष्ण भक्ति काव्य की भाषा।  
      ● सूरदास ने ब्रजभाषा को काव्य-लालित्य और अर्थ-गौरव की भाषा बनाया।  
          ○ उदाहरण: "जसोदा हरि पालनै झुलावै"
      ● तुलसीदास की विनय पत्रिका और कवितावली।  
      ● रसखान और रहीम ने ब्रजभाषा को आमजन की भाषा के करीब लाया।  
      ● रीतिकाल में केशवदास, मतिराम, पद्माकर आदि ने शास्त्रीय विवेचन की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया।  
      ● बिहारी की ब्रजभाषा में शृंगारिक लालित्य।  
    ● तृतीय चरण (1800 ई. से अब तक):  
      ● आधुनिक युग में भारतेंदु हरिश्चन्द्र, प्रेमधन, जगन्नाथ दास, रत्नाकर आदि ने साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रजभाषा को जीवित रखा।  
      ● द्विवेदी युग में ब्रजभाषा का साहित्यिक आसन कमजोर हुआ।  
  ● उदाहरण और विशेषताएँ:  
    ● गोरखनाथ की उक्ति में ऐकारान्तता और मत्स्येंद्रनाथ की उक्ति में ओकारांतता ब्रजभाषा की विशेषताएँ।  
    ● विष्णुदास के ग्रंथों में ब्रजभाषा का स्थिर स्वरूप।  
    ● नारायणदास की छिताई वार्ता, मणिक की बैताल पचीसी आदि प्रारंभिक ब्रजभाषा के काव्य।  
  ● साहित्यिक योगदान:  
    ● सूरदास, तुलसीदास, रसखान, बिहारी आदि ने ब्रजभाषा को साहित्यिक ऊँचाई पर पहुँचाया।  
    ● रीतिकाल में ब्रजभाषा का शास्त्रीय और शृंगारिक रूप।  
 ब्रजभाषा का विकास मध्यकाल में साहित्यिक भाषा के रूप में विभिन्न चरणों में हुआ, जिसमें धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक योगदान महत्वपूर्ण रहे।

Conclusion

मध्यकाल में ब्रज भाषा का विकास साहित्यिक रूप में महत्वपूर्ण था। सूरदास, कबीर, और मीरा बाई जैसे कवियों ने इसे समृद्ध किया। भक्ति आंदोलन ने ब्रज को जनमानस की भाषा बनाया। डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, "ब्रज भाषा ने भक्ति साहित्य को नया आयाम दिया।" आज भी ब्रज की मिठास और सरलता साहित्य में प्रेरणा का स्रोत है। भविष्य में, इसे संरक्षित और प्रोत्साहित करना आवश्यक है ताकि इसकी सांस्कृतिक धरोहर जीवित रहे।