मध्यकाल में काव्यभाषा के रूप में प्रयुक्त अवध की विशेषताएँ। (UPSC 2016, 10 Marks, )

Theme: मध्यकालीन काव्यभाषा: अवध की विशेषताएँ Where in Syllabus: (Medieval Indian Literature.)
मध्यकाल में काव्यभाषा के रूप में प्रयुक्त अवध की विशेषताएँ।

Introduction

मध्यकाल में अवध की काव्यभाषा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तुलसीदास और कबीर जैसे कवियों ने इसे अपनाया, जिससे यह जनमानस में लोकप्रिय हुई। इस भाषा की विशेषता इसकी सरलता और भावप्रवणता है, जो इसे जनसाधारण के लिए सुलभ बनाती है। रामचरितमानस और साखी जैसे ग्रंथों में इसका प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। अवध की काव्यभाषा ने भक्ति आंदोलन को भी प्रोत्साहित किया, जिससे सामाजिक और धार्मिक चेतना का विकास हुआ।

मध्यकालीन काव्यभाषा: अवध की विशेषताएँ

 ● अवधी का उद्भव:  
    ● अर्धमागधी प्राकृत से विकसित कोसली अपभ्रंश से अवधी का विकास हुआ।  
    ● 'कुवलयमाला' की भाषा से समानता, साथ ही 'प्रबंध चिंतामणि', 'उक्ति-व्यक्ति प्रकरण', और प्राकृत पैंङ्गलम में अवधी के प्रारंभिक लक्षण मौजूद हैं।  
  ● भाषाई विशेषताएँ:  
    ● इकारांतता की प्रवृत्ति अवधी की प्रारंभिक विशेषता है।  
        ○ अपभ्रंश के शब्दों से अवधी के शब्द निष्पन्न हुए हैं। उदाहरण: कसुकरू > केहिकर, पयट्ठ > पैठ, कवण > कवन
  ● अवधी का विकास:  
    ● प्रथम चरण: आरंभ से लेकर 1400 ई. तक।  
    ● द्वितीय चरण: 1400 ई. से लेकर 1700 ई. तक।  
    ● तृतीय चरण: 1700 ई. से अब तक।  
  ● साहित्यिक योगदान:  
    ● मुल्ला दाउद की 'लोरकाहा' में अवधी के समस्त अभिलक्षण।  
    ● कुतबन की 'मृगावती', मंझन की 'मधुमालती', जायसी की 'पद्मावत' में अवधी का साहित्यिक रूप।  
    ● तुलसी ने तत्सम शब्दों को प्रतिष्ठित किया।  
    ● उस्मान की 'चित्रावली' और आलम की 'माधवानल कामकंदला' में तद्भव शब्दों का प्रयोग।  
  ● व्याकरणिक विशेषताएँ:  
        ○ अवधी में अर्धसंवृत है।
    ● इआ, उआ में क्रमशः य-श्रुति एवं व-श्रुति नहीं है।  
        ○ प्राचीन , , के स्थान पर अवधी में सिर्फ 'स' मिलता है।
    ● , संध्याक्षर हैं जैसे: अइ, अऊ।  
    ● स्व, , में अतिरिक्त स्वर पाए जाते हैं।  
    ● 'ण' के स्थान पर मिलता है: जैसे गुन (गुण), लछमन (लक्ष्मण)।  
    ● को व्यंजन रूप में और स्वर रूप में या बोला जाता है।  
    ● का व्यंजन रूप उच्चारण 'ज' एवं स्वर रूप उच्चारण जैसा होता है।  

Conclusion

मध्यकाल में अवध की काव्यभाषा ने साहित्यिक समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसकी विशेषताएँ सरलता, भावप्रवणता और लोकजीवन से जुड़ाव थीं। तुलसीदास और कबीर जैसे कवियों ने इसे अपनाकर जनमानस को प्रभावित किया। रामचरितमानस और साखी जैसे ग्रंथों ने इसे अमर बना दिया। डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, "अवधी ने हिंदी साहित्य को जनभाषा का स्वरूप दिया।" भविष्य में, इस भाषा की समृद्धि को संरक्षित और प्रोत्साहित करना आवश्यक है।