अवध की व्याकरणिक विशेषताओं का निरूपण कीजिए।
(UPSC 2022, 15 Marks, )
Theme:
अवधी भाषा की व्याकरणिक विशेषताएँ
Where in Syllabus:
(The subject of the above question is "Linguistics.")
अवध की व्याकरणिक विशेषताओं का निरूपण कीजिए।
अवध की व्याकरणिक विशेषताओं का निरूपण कीजिए।
(UPSC 2022, 15 Marks, )
Theme:
अवधी भाषा की व्याकरणिक विशेषताएँ
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(The subject of the above question is "Linguistics.")
अवध की व्याकरणिक विशेषताओं का निरूपण कीजिए।
Introduction
अवध की व्याकरणिक विशेषताओं का अध्ययन भाषाविज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। डॉ. गणेश प्रसाद शुक्ल और डॉ. रामनरेश त्रिपाठी जैसे विद्वानों ने अवध की भाषा की संरचना और उसके व्याकरणिक पहलुओं पर गहन शोध किया है। अवध की भाषा में तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों का अनूठा मिश्रण है, जो इसे विशिष्ट बनाता है। इसके व्याकरण में संधि, समास और विभक्ति का विशेष महत्व है, जो इसकी पहचान को परिभाषित करते हैं।
अवधी भाषा की व्याकरणिक विशेषताएँ
● अवधी का 'अ': अवधी भाषा में 'अ' ध्वनि अर्ध संवृत होती है।
● य-श्रुति और व-श्रुति: 'इआ' और 'उआ' के बीच क्रमशः य-श्रुति और व-श्रुति नहीं मिलती। उदाहरण: सिआर, गुआल।
● ध्वनि परिवर्तन: 'श', 'ष' और 'स' के बदले सिर्फ 'स' का प्रयोग होता है। 'ण' की जगह पर 'न' का प्रचलन है। उदाहरण: गुन, लवन, गणपति।
● व का उच्चारण: 'व' का व्यंजन रूप में उच्चारण 'व' और स्वर रूप में 'उ' अथवा 'ओ' होता है। उदाहरण: वाहन, व्याकुल, वलदेउ, ओकील।
● संध्यक्षर: 'ऐ' और 'औ' संध्याक्षर हैं - अई, अउ। उदाहरण: जइसे, कइसे, पइसा, अउनर, कउवा।
● अकारान्त और इकारान्त प्रधानता: अवधी भाषा अकारान्त और इकारान्त प्रधान है। विशेषण और संबंधवाची सर्वनाम रूप प्रायः अकारान्त होते हैं। उदाहरण: बड़, छोट, भल, नीक, मोर, तोर, हमार।
● कर्ता कारक: कर्ता कारक का 'ने' परसर्ग नहीं मिलता है।
● अन्य परसर्ग: कहं, केर, कर, मांझ, मांह, मंह, कुं, से, सेनी, सन आदि।
● संज्ञा शब्दों के रूप: संज्ञा शब्दों के एक ही वचन में तीन रूप मिलते हैं - सामान्य, दीर्घ, दीर्घतर। उदाहरण: घोड़ा, घोड़वा, घोड़वना/घोड़ॉना।
● दीर्घरूप: 'वा' वाले दीर्घरूप व्यक्ति वाचक संज्ञाओं और विदेशी शब्दों में भी मिलते हैं। उदाहरण: जगदीसवा, विसनथवा, रजिस्टरवा।
● बहुवचन: बहुवचन मानक हिंदी की तरह ही बनते हैं, लेकिन तियेक रूप में 'न' लगाकर बहुवचन बनाए जाते हैं। उदाहरण: हजामन, बनरन।
● स्त्री प्रत्यय: हिंदी की तरह ही हैं, लेकिन सिर्फ इकारान्तता आ जाती है। उदाहरण: नि, इनि, आइनि।
● सम्बन्ध वाचक सर्वनाम: जे, जेइ, जवन।
● प्रश्नवाचक सर्वनाम: के, कवन।
● सार्वनामिक विशेषण: अस, जस, तस।
● विशेषण का लिंग निर्धारण: अवधी में संज्ञा के लिंग के अनुरूप विशेषण का लिंग निर्धारित होता है। उदाहरण: आपन आपनि, ओहिका ओहिकी।
● सहायक क्रियाएं: आटे, बाटे, है, अहै।
● भूतकाल: भूतकाल में 'भए', 'रहें' जैसे रूप चलते हैं।
● भविष्यत् काल: ह-ब- लगाकर रूप बनाए जाते हैं। उदाहरण: रहिहै, रहव।
● वर्तमान कालिक कृदन्त रूप: त/इत प्रत्यय के योग से बनते हैं। उदाहरण: सुनत/सुनित, मारत/मारित।
● भूतकालिक कृदन्त रूप: हिंदी की तरह ही आ प्रत्ययान्त हैं। उदाहरण: कहा, सुना, रहा।
● संज्ञार्थक क्रिया के रूप: ब- प्रत्ययांत हैं। उदाहरण: कहब, सुनब, रहब।
● य-श्रुति और व-श्रुति: 'इआ' और 'उआ' के बीच क्रमशः य-श्रुति और व-श्रुति नहीं मिलती। उदाहरण: सिआर, गुआल।
● ध्वनि परिवर्तन: 'श', 'ष' और 'स' के बदले सिर्फ 'स' का प्रयोग होता है। 'ण' की जगह पर 'न' का प्रचलन है। उदाहरण: गुन, लवन, गणपति।
● व का उच्चारण: 'व' का व्यंजन रूप में उच्चारण 'व' और स्वर रूप में 'उ' अथवा 'ओ' होता है। उदाहरण: वाहन, व्याकुल, वलदेउ, ओकील।
● संध्यक्षर: 'ऐ' और 'औ' संध्याक्षर हैं - अई, अउ। उदाहरण: जइसे, कइसे, पइसा, अउनर, कउवा।
● अकारान्त और इकारान्त प्रधानता: अवधी भाषा अकारान्त और इकारान्त प्रधान है। विशेषण और संबंधवाची सर्वनाम रूप प्रायः अकारान्त होते हैं। उदाहरण: बड़, छोट, भल, नीक, मोर, तोर, हमार।
● कर्ता कारक: कर्ता कारक का 'ने' परसर्ग नहीं मिलता है।
● अन्य परसर्ग: कहं, केर, कर, मांझ, मांह, मंह, कुं, से, सेनी, सन आदि।
● संज्ञा शब्दों के रूप: संज्ञा शब्दों के एक ही वचन में तीन रूप मिलते हैं - सामान्य, दीर्घ, दीर्घतर। उदाहरण: घोड़ा, घोड़वा, घोड़वना/घोड़ॉना।
● दीर्घरूप: 'वा' वाले दीर्घरूप व्यक्ति वाचक संज्ञाओं और विदेशी शब्दों में भी मिलते हैं। उदाहरण: जगदीसवा, विसनथवा, रजिस्टरवा।
● बहुवचन: बहुवचन मानक हिंदी की तरह ही बनते हैं, लेकिन तियेक रूप में 'न' लगाकर बहुवचन बनाए जाते हैं। उदाहरण: हजामन, बनरन।
● स्त्री प्रत्यय: हिंदी की तरह ही हैं, लेकिन सिर्फ इकारान्तता आ जाती है। उदाहरण: नि, इनि, आइनि।
● सम्बन्ध वाचक सर्वनाम: जे, जेइ, जवन।
● प्रश्नवाचक सर्वनाम: के, कवन।
● सार्वनामिक विशेषण: अस, जस, तस।
● विशेषण का लिंग निर्धारण: अवधी में संज्ञा के लिंग के अनुरूप विशेषण का लिंग निर्धारित होता है। उदाहरण: आपन आपनि, ओहिका ओहिकी।
● सहायक क्रियाएं: आटे, बाटे, है, अहै।
● भूतकाल: भूतकाल में 'भए', 'रहें' जैसे रूप चलते हैं।
● भविष्यत् काल: ह-ब- लगाकर रूप बनाए जाते हैं। उदाहरण: रहिहै, रहव।
● वर्तमान कालिक कृदन्त रूप: त/इत प्रत्यय के योग से बनते हैं। उदाहरण: सुनत/सुनित, मारत/मारित।
● भूतकालिक कृदन्त रूप: हिंदी की तरह ही आ प्रत्ययान्त हैं। उदाहरण: कहा, सुना, रहा।
● संज्ञार्थक क्रिया के रूप: ब- प्रत्ययांत हैं। उदाहरण: कहब, सुनब, रहब।
Conclusion
अवध की व्याकरणिक विशेषताएँ इसकी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाती हैं। अवधी भाषा में तद्भव शब्दों का प्रचुर प्रयोग होता है, जो इसे अन्य भाषाओं से अलग बनाता है। रामचंद्र शुक्ल ने अवधी को लोकभाषा के रूप में महत्वपूर्ण बताया है। इसके व्याकरण में सरलता और लचीलापन है, जो इसे जनमानस में लोकप्रिय बनाता है। भविष्य में, अवधी के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए शैक्षणिक संस्थानों में इसके अध्ययन को बढ़ावा देना आवश्यक है।