ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताओं का निरूपण कीजिए। (UPSC 2021, 15 Marks, )

Theme: ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताएँ Where in Syllabus: (The subject of the above question is "Linguistics.")
ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताओं का निरूपण कीजिए।

Introduction

ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताओं का अध्ययन भारतीय भाषाविज्ञान में महत्वपूर्ण है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी और डॉ. रामविलास शर्मा जैसे विद्वानों ने इसके व्याकरणिक ढांचे पर गहन शोध किया है। ब्रजभाषा की विशेषताएं जैसे संधि-विच्छेद, समास, और प्रत्यय इसे अन्य भाषाओं से अलग बनाते हैं। इसकी ध्वन्यात्मकता और लयात्मकता इसे साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से समृद्ध बनाती हैं।

ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताएँ

 ● ध्वनि व्यवस्था:  
    ● उच्चारण प्रवृत्तिः: ब्रजभाषा में ओकारांतता की प्रवृत्ति पाई जाती है। उदाहरण: चलो, गयो, झगरो।  
    ● शब्दों के अंत में हुस्ब 'ई' और 'उ': जैसे बहुरि, करि, मनु, कालु का प्रयोग होता है।  
    ● हिंदी में पद के अंत में 'ए', 'ओ': इनके स्थान पर 'ऐ', 'औ' पाये जाते हैं। उदाहरण: करै, घर मै, साधु कौ।  
    ● र -> ड़ और 'ण' -> न: जैसे बाण -> बान और परे -> पड़े।  
    ● व्यंजन के अल्पप्राण होने की प्रवृत्ति: जैसे बारा (बारह), तुमारो, हात (हाथ), मुझ -> मुज।  
  ● व्याकरण व्यवस्था:  
    ● संज्ञा रूप: इसमें संज्ञा के एक ही रूप मिलते हैं।  
    ● सर्वनाम रूप: सर्वनाम के दो रूप एकवचन तथा बहुवचन प्राप्त होते हैं।  
      ● उत्तम पुरुष: एकवचन: मैं, हों, मोहिं, मेंरों; बहुवचन: हम, हमन, हमारों।  
      ● मध्यम पुरुष: तू, तोहि, तैरों; तुम, तुम्हें, तुम्हारों।  
      ● अन्य पुरुष: वौ, वह, वाकों; वे, वैं, उन, उनको।  
    ● लिंग व्यवस्था:  
          ○ स्त्रीलिंग के लिए ई, इया, आइन, आनी प्रत्यय जैसे गोरी, ललाइन, अखियां का प्रयोग होता था।
          ○ कहीं-कहीं नपुसंक लिंग जैसे सोना का सोनों का भी प्रयोग दिखता है।
    ● वचन व्यवस्था:  
          ○ एकवचन शब्दों को बहुवचन बनाने वाले प्रत्ययों के दो रूप मिलते हैं।
      ● अनुनासिक: चंद्र बिंदु जैसे 'अखियां हरिदर्शन की प्यासी' तथा 'न' या 'अन' रूप जैसे ब्रजवासिन।  
      ● प्रत्यय: ऐ, अन, इन प्रत्ययों का प्रयोग जैसे किताबें, किताबन, रोटिन।  
    ● क्रिया व्यवस्था:  
      ● वर्तमान काल: 'त' रूप जैसे करत, जात का प्रयोग।  
      ● भूत काल: 'औ' रूप (कियौ, उठो) तथा 'न' रूप (लीना, दीनी) का प्रयोग।  
      ● भविष्य काल: 'ग' रूप जैसे करेंगे, तथा 'छः' रूप जैसे करिहैं का प्रयोग।  
      ● सहायक क्रिया: वर्तमान हेतु 'ह', भूतकाल हेतु 'त', भविष्य काल हेतु 'ग' रूप।  
      ● संज्ञार्थ क्रियाएं: 'न' रूप का प्रयोग।  
  ● कारक व्यवस्था:  
    ● निर्विभक्तिक प्रयोग: नहीं के बराबर होता है।  
    ● कर्ता: नै (केवल भूतकालिक सम्पर्क में 'नं')  
    ● कर्म: को, कौ, काँ  
    ● करण: तें, तैं, सौं  
    ● सम्प्रदान: लौं  
    ● अपादान: लागि  
    ● संबंध: धौं, को, के, की  
    ● अधिकरण: मैं, माहि, पै (खेलन मैं काको गुसैया)  

Conclusion

ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताएँ इसे अन्य भाषाओं से अलग बनाती हैं। इसमें स्वर और व्यंजन की विशिष्ट ध्वनियाँ, संधि और समास का अनूठा प्रयोग, तथा क्रियाओं का विशेष रूप से उपयोग होता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे साहित्यिक भाषा के रूप में महत्वपूर्ण बताया है। भविष्य में ब्रजभाषा के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए शैक्षणिक संस्थानों में इसे शामिल करना आवश्यक है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, ब्रजभाषा की समृद्धि भारतीय संस्कृति की धरोहर है।